डी.ए.पी. के अत्यधिक उपयोग वाले देश के 100 जिलों में शामिल बेमेतरा, किसानों को जैविक एवं संतुलित खेती के लिए किया जा रहा प्रेरित’
कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय द्वारा देश में सर्वाधिक डी.ए.पी. उर्वरक उपयोग करने वाले 100 जिलों की सूची में छत्तीसगढ़ का बेमेतरा जिला एकमात्र जिला शामिल किया गया है। वर्ष 2025 में जिले में कुल 27,381 मीट्रिक टन डी.ए.पी. की खपत दर्ज की गई, जो राज्य में सर्वाधिक रही। इसी को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार द्वारा बेमेतरा जिले में 31 मई से 27 जून 2026 तक “संतुलित उर्वरक उपयोग विशेष जागरूकता अभियान” संचालित किया जा रहा है।
मिट्टी परीक्षण एवं अनुसंधान (आईजीकेवी रायपुर एवं आईसीएआर-एनबीएसएसएलयूपी, 2022) के अनुसार बेमेतरा की कृषि भूमि में फास्फोरस एवं पोटाश की उपलब्धता माध्यम से उच्च स्तर पर है, जबकि नत्रजन एवं जैविक कार्बन की मात्रा निम्न से मध्यम पाई गई है। ऐसे में किसानों को संतुलित एवं वैज्ञानिक उर्वरक उपयोग के प्रति जागरूक करने हेतु कृषि विज्ञान केन्द्र एवं कृषि विभाग, बेमेतरा द्वारा राज्य सरकार के महत्वाकांक्षी “विकसित कृषि संकल्प अभियान” के साथ संयुक्त रूप से विभिन्न ग्राम पंचायतों में प्रशिक्षण, कृषक संगोष्ठी, जागरूकता कार्यक्रम एवं विधि प्रदर्शन आयोजित किए जा रहे हैं।
इसी क्रम में विकासखंड बेमेतरा के ग्राम पंचायत लालपुर में संतुलित उर्वरक उपयोग विषय पर विशेष जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में कृषि तकनीक अनुप्रयोग अनुसंधान संस्थान (अटारी), आईसीएआर जबलपुर से आए वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. रजनीश श्रीवास्तव ने किसानों को फसलों की उचित वृद्धि एवं बेहतर उत्पादन के लिए आवश्यक प्रमुख एवं सूक्ष्म पोषक तत्वों के महत्व की जानकारी दी। उन्होंने पोषक तत्वों की कमी के लक्षणों पर प्रकाश डालते हुए बीजामृत, जीवामृत, हरी खाद, नील हरित काई, एजोस्पिरिलम, एजोटोबैक्टर, पी.एस.बी., के.एस.बी. एवं माइकोराइजा जैसे जैविक खाद एवं जैव उर्वरकों के उपयोग के लिए किसानों को प्रेरित किया।
कृषि विज्ञान केन्द्र, बेमेतरा के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुख श्री तोषण कुमार ठाकुर ने किसानों को पारंपरिक उर्वरकों यूरिया एवं डी.ए.पी. के अलावा एस.एस.पी., टी.एस.पी., एन.पी.के. कंसोर्टिया, 12ः32ः16, 20ः20ः0ः13, 14ः35ः14, 10ः26ः26, 16ः16ः16 तथा 19ः19ः19 जैसे वैकल्पिक उर्वरकों की उपयोगिता की जानकारी दी।
उन्होंने नैनो यूरिया (16%) एवं नैनो डी.ए.पी. (8ः16%) के प्रभावी उपयोग पर भी जोर देते हुए बताया कि इनके पोषक तत्व फसलें आसानी से अवशोषित कर लेती हैं, जिससे उर्वरक उपयोग क्षमता बढ़ती है। उन्होंने यह भी बताया कि फसलों की पोषक तत्व आवश्यकता फसल के प्रकार, किस्म, उत्पादन लक्ष्य एवं मिट्टी की प्रकृति पर निर्भर करती है, जिसकी पूर्ति वैज्ञानिक तरीके से विभिन्न उर्वरकों के संतुलित उपयोग से की जा सकती है। वहीं एन.आई.बी.एस.एम. रायपुर की वैज्ञानिक डॉ. श्रावणी सान्याल ने असंतुलित उर्वरक उपयोग से मिट्टी की गुणवत्ता एवं पर्यावरण पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों के प्रति किसानों को जागरूक किया।
तकनीकी सत्र में केवीके की वैज्ञानिक डॉ. रजनी डी. अगाशे ने नील हरित काई उत्पादन तकनीक की जानकारी दी, जबकि वैज्ञानिक श्री डोमन सिंह टेकाम ने प्राकृतिक खेती के महत्व एवं उसके लाभों पर प्रकाश डाला। वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारी श्री वी.के. टंडन ने किसानों को जैविक खेती अपनाने एवं टिकाऊ कृषि के लिए रासायनिक खाद पर निर्भरता कम करने हेतु प्रेरित किया।
कार्यक्रम के अंत में किसान-वैज्ञानिक परिचर्चा आयोजित की गई, जिसमें किसानों की कृषि संबंधी समस्याओं एवं तकनीकी प्रश्नों का समाधान विशेषज्ञों द्वारा किया गया। कार्यक्रम में ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी श्री गजेन्द्र नवरंग, श्री लोचन प्रसाद ठाकुर, श्री माधव चंद्रवंशी, ग्राम पंचायत लालपुर के उपसरपंच श्री ऋतु साहू सहित 50 से अधिक कृषक उपस्थित रहे।