Explainer: 457 साल बाद बदला दुनिया का नक्शा, क्यों खुश हुआ अफ्रीका और US नाराज; UN में वोटिंग में भारत ने किसे दिया समर्थन…

दुनिया के नक्शे को लोग बचपन से देखते आए हैं। किताबों से लेकर टेलीविजन और इंटरनेट की दुनिया में भी वर्ल्ड मैप को देखा जा सकता है, लेकिन क्या आप जानते हैं करीब 450 साल बाद दुनिया का नक्शा बदल गया है।

संयुक्त राष्ट्र महासभा में शुक्रवार, 4 सितंबर को एक नए विश्व मानचित्र को अपनाने के लिए मतदान हुआ। इस नक्शे में अफ्रीकी महाद्वीप को बड़ा दिखाया गया है, जबकि उत्तरी अमेरिका और यूरोप को छोटा दिखाया गया है।

यूनाइटेड नेशन्स में इस मानचित्र को आधिकारिक तौर पर मानने के लिए वोटिंग भी की गई, जिसमें सिर्फ अमेरिका ने विपक्ष में वोट दिया। वहीं भारत-फ्रांस और यूनाइटेड किंगडम समेत दुनिया के 164 देशों ने नए मानचित्र के प्रस्ताव का समर्थन किया और छह अन्य देशों ने वोटिंग में हिस्सा नहीं लिया।

यूनाइटेड नेशन्स में किसी प्रस्ताव को मंजूरी के लिए दो-तिहाई बहुमत की जरूरत होती है। वहीं 193 सदस्य देशों के इस संगठन में नए मानचित्र के प्रस्ताव को 164 देशों को समर्थन मिल गया। अब इसे ही दुनिया का नक्शा माना जाएगा।

मानचित्र के बदलने के साथ ही ये सवाल सामने आता है कि जिस मानचित्र का इस्तेमाल पूरी दुनिया 457 सालों से कर रही है, तो आखिर उस नक्शे को बदलने की जरूरत क्यों महसूस हई। आइए जानते हैं कि 457 साल पहले किसने दुनिया का नक्शा बनाया और अब इसे क्यों बदला गया है।

दुनिया को मिल गया नया मानचित्र

यूनाइटेड नेशन्स में नए मानचित्र को लेकर रखे गए प्रस्ताव में कहा गया है, ‘नया नक्शा, जिसे इक्वल अर्थ कार्टोग्राफिक प्रोजेक्शन के नाम से जाना जाता है, दुनिया के मानचित्रण की सटीकता को बेहतर बनाता है।’

अब नए नक्शे को समर्थन मिलने के बाद यूनाइटेड नेशन्स का कहना है कि ‘मर्केटर प्रोजेक्शन’ के बजाय नए नक्शे का उपयोग किया जाए।

अफ्रीकी यूनियन (AU) के सदस्यों के समर्थन के साथ टोगो के विदेश मंत्री रॉबर्ट डुसी ने इस प्रस्ताव को पेश किया था। रॉबर्ट डुसी ने प्रस्ताव पेश करते हुए कहा, ‘नक्शे शिक्षा का मार्गदर्शन करते हैं, कल्पना को बढ़ावा देते हैं और सामूहिक सोच को प्रभावित करते हैं, इसलिए वे कभी भी तटस्थ नहीं होते।’

टोगो के विदेश मंत्री ने कहा, ‘जब वे हमारे ग्रह की गलत तस्वीर पेश करते हैं, तो गलत जानकारी पीढ़ियों तक आगे बढ़ती रहती है।’

आखिर अमेरिका क्यों हुआ नाराज?

यूनाइटेड नेशन्स में प्रस्तावित नया मानचित्र अमेरिका को पसंद नहीं आया, इसलिए सभी सदस्य देशों में से सिर्फ अमेरिका ने ही इस नए मानचित्र का समर्थन नहीं किया।

अमेरिका ने इस प्रस्ताव की कड़ी आलोचना करते हुए यूनाइटेड नेशन्स में कहा, ‘ऐसे कदमों के कारण ही यह संस्था अपनी विश्वसनीयता खो रही है।’

अमेरिकी प्रतिनिधि यारिना फेरेंसेविच ने वोटिंग से पहले कहा, ‘असली समस्याओं पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय, यह संस्था 16वीं सदी के नक्शों और मुआवजे व संज्ञानात्मक न्याय को बढ़ावा देने में उनकी भूमिका पर बहस कर रही है।’

457 साल बाद बदला गया नक्शा

दुनिया में सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया जाने वाला नक्शा 1569 में बनाया गया मर्केटर मानचित्र है। इसे यूरोप के मैप मेकर जेरार्डस मर्केटर ने बनाया था। मर्केटर ने ये नक्शा इसलिए बनाया था, ताकि यूरोपीय खोजकर्ताओं को दुनियाभर में यात्रा करने में मदद मिल सके।

457 साल पहले बने इस नक्शे को आज भी आधिकारिक तौर पर माना जाता है, लेकिन मर्केटर नक्शा पृथ्वी के घुमाव को दिखाने के लिए भूमध्य रेखा के पास के देशों को उनके असल आकार से छोटा और ध्रुवों के पास के देशों को बड़ा दिखाता है।

मर्केटर के नक्शे को ठीक करने की कोशिश में, 2018 में कार्टोग्राफर्स की एक टीम ने समान क्षेत्रफल वाला नक्शा बनाया, जिसे उन्होंने ‘इक्वल अर्थ प्रोजेक्शन (Equal Earth Projection)’ नाम दिया।

अफ्रीकी यूनियन (AU) के 54 सदस्य देशों ने इस मानचित्र को सही माना और कहा कि यह सभी महाद्वीपों, खासकर अफ्रीका के आकार को ज्यादा सही ढंग से दिखाता है।’

क्यों बदला गया दुनिया का नक्शा?

मर्केटर मानचित्र को ही बीते 450 सालों से इसलिए इस्तेमाल किया जा रहा है कि क्योंकि ये मैप समुद्री रास्ते की जानकारी काफी सटीक देता है, जिससे जहाजों के नेविगेशन में दिक्कत नहीं होती, लेकिन जेरार्डस मर्केटर ने इस नक्शे को पूरी तरह सपाट बनाया और यही इसके बदलने का कारण है।

मर्केटर मानचित्र की तरफ ध्यान दें तो पता चलता है कि जैसे-जैसे भूमध्य रेखा से दूर की तरफ जाते हैं, तो नक्शा जरूरत से ज्यादा बड़ा दिखाई देने लगता है। यही कारण है कि उत्तरी और दक्षिणी हिस्सों के कई इलाके असल से काफी बड़े नजर आते हैं।

मर्केटर के नक्शे में ग्रीनलैंड और अफ्रीका को करीब एक ही जैसा दिखाया गया है, लेकिन हकीकत में आकार में बहुत बड़ा अंतर है। ग्रीनलैंड का क्षेत्रफल करीब 22 लाख वर्ग किलोमीटर है, वहीं अफ्रीका का क्षेत्रफल करीब 3 करोड़ वर्ग किलोमीटर है।

देखा जाए तो अफ्रीका, ग्रीनलैंड से करीब 14 गुना बड़ा है, लेकिन मर्केटर मानचित्र पर बराबर ही दिखाई देता है। इसी के चलते नक्शे में बदलाव की जरूरत महसूस हुई।

भारत ने किया नए नक्शे का समर्थन

यूनाइटेड नेशन्स में वोटिंग के दौरान भारत ने भी नए नक्शे के समर्थन में वोट किया। इस नए मानचित्र का मकसद दुनिया के मैप को ठीक करना है, ताकि महाद्वीपों के आकार को ज्यादा सही ढंग से दिखाया जा सके।

‘मैप को ठीक करना: ग्लोबल कार्टोग्राफिक रिप्रेजेंटेशन को संतुलित करना और दुनिया के क्षेत्रों, खासकर अफ्रीका का सही प्रतिनिधित्व बढ़ाना’ नाम के इस प्रस्ताव में कहा गया है कि आम तौर पर इस्तेमाल होने वाले दुनिया के मैप भूमध्य रेखा (इक्वेटर) के उत्तर और दक्षिण में मौजूद जमीन के हिस्सों (लैंडमास) के आकार को गलत तरीके से दिखाते हैं।

इसमें चिंता जताई गई है कि इसकी वजह से अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और दक्षिण एशिया का आकार असलियत से कम दिखता है और दुनिया की एक असंतुलित तस्वीर बनी हुई है।

अफ्रीका के समर्थन में फ्रांस

फ्रांस ने भी नए मैप का समर्थन करते हुए शुक्रवार को घोषणा की कि वह मर्केटर प्रोजेक्शन (Mercator projection) का उपयोग बंद कर देगा।

फ्रांस के विदेश मंत्री जीन-नोएल बैरोट ने कहा, ‘उस मैप में अफ्रीका, लैटिन अमेरिका या दक्षिण-पूर्व एशिया की तुलना में संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस और चीन का आकार असामान्य रूप से बड़ा दिखता है जबकि ग्रीनलैंड लगभग अफ्रीका जितना बड़ा दिखाई देता है।’

जीन-नोएल बैरोट ने आगे कहा, ‘मैप बदलने से जाहिर है कि दुनिया नहीं बदलती। लेकिन गलत तरीके से दिखाए गए नक्शे को सही करना सच को सामने लाने जैसा है।’

फ्रांस की तरफ से यह पहल ऐसे समय में की गई है जब वह अफ्रीका के साथ संबंध सुधारने की कोशिश कर रहा है, खासकर उन पूर्व उपनिवेशों के साथ जिनके साथ उसके संबंध तनावपूर्ण रहे हैं।

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