पाठकों की कलम से

अनु की कलम से…

खुशियों का सैलाब आया, फिर क्यों आँखों मे आंसू चमक आया.शायद मुददतों के इंतजार का, प्यारा सा जवाब आया. सुखी शाख पर बाहर छाया, बदलते मौसम का त्यौहार आया. आशाओं की उम्र भी ढल रही थीं,  उस पर किस्मत का पैगाम आया. नन्ही नन्ही ख्वाइशों को सजाया, की आज खुदा के घर से कोई आया. एक दिया तेरे नाम का जलाया, की सच्ची दुआ का सिला आया. अब ख्वाइशों की खवाइश नहीं,जब से तेरे होने का एहसास पाया

अनु की कलम से…

लिख नहीं पाउँगा यूँ दर्द मेरा, कैसे बनेगा स्याही ये आँसू मेरा.जल उठेगा ये कागज, सुनके फ़साना मेरा, शब्दों को बहा ले जायेगा आँसुओ का सैलाब मेरा. तूफान लोट आएगा, यादों का तेरा फिर दर्द से कहरा उठेगा चेहरा मेरा. उभरने के लिए थामु दामन तो किसका, की उंगलियों मे लगी आग ने जाला दिया दामन तेरा. चाह थी जीने की, बनके साथी तेरा, अब मै ही नहीं रहा बनके अपना मेरा. यूँ ही अक्सर शब्दों संग बांटा दर्द मेरा, की लगी आग ने जाला दिया आशियाना मेरा.

अनु की कलम से…

एक रहस्य है जिंदगानी  , एक सांस आनी और फिर है जानी. जो समझे इसे वो ज़िले एक पल मे पूरी जिंदगानी. एक आंख से रोना दूजे से ख़ुशी दिखानी. दूजे के मुस्कान मैं ख़ुदकी ख़ुशी है  सजानी. गुजारा वक्त भी लौट आएगा बस एक आवाज़ है लगानी. मंजिलों की चाह में क़दमे रास्तों की दीवानी. हौसला कम ना हो इसलिए रखना हर चाल मस्तानी. अंधेरे भी घुल जायेंगे बस जलाये रखना चांदनी. छोटी सी है ये कहानी अपनाओ तो है अपनी वरना है अनजानी.

अनु की कलम से…

भिंगी पलकों में चमकती मुस्कान देखी,जैसे  रेत  के समंदर में गुलशन देखी. आज के आँखों में, कल की तस्वीर देखी , जैसे हांथो की लकीरों में तकदीर दिखी. खामोश लबों पे पढ़ी कहानी देखी, जैसे सुखे गुलाब में एक बून्द दिखी. शांत चेहरे पे कुछ लकीरें देखी, जैसे गहरे सागर में कुछ लहरें देखी |सदियों के फसलों में क़रीबी देखी, जैसे संग चलते कोई परछाई देखी |अनछुए जस्बातों के महफिल देखी,जैसे भीड़ में घूम कोई  तन्हाई देखी |

गुमनाम की कलम से…

शतरंज सी जिन्दगी में,कौन किसका मोहरा है…आदमी एक है,मगर सबका किरदार दोहरा है…!!!

गुमनाम की कलम से…

ज़िन्दगी से बड़ी कोई सजा ही नहीं…और क्या जुर्म है ये पता नहीं…!!!इतने हिस्सों मैं बट गया हूँ मैं…मेरे हिस्से मैं कुछ बचा ही नहीं ….

गुमनाम की कलम से…

कुछ सवालों को सवाल ही रहने दे ग़ालिब, क्या पता जवाब दूर न कर दे तुमको हमसे…बस अब इस क्व्वाब मैं जीने दो मुझे …न कहो मुझसे  मेरी आँखों खोल दो …क्या पता जब खुल जाये ये आँखें तो ये कहीं खवाब न बन जाये …!!!

अनु की कलम से…

नज़रो से दूर होकर भी अगर वो पास हो तो बात कुछ और हो. कुछ भी ना कहु मैं और, वो समझा करें तो बात कुछ और हो. दिल में भी नाम उनका लूं, वो सामने खड़े हों तो बात कुछ और हो. परेशान भोझल आँखों में भी, उसकी मुस्कान हो तो बात कुछ और हो. मेरे तन्हा कदमो के संग, वो कुछ कदम चले तो बात कुछ और हो. वो अगर भूल जाये मुझे, तो खुदा करें की बात कुछ और हो. टूटती हैं वफ़ा और एतबार भी, बार बार जुड़ जाये आदमी तो बात कुछ और हो. तुझको पाने की उम्मीद और भी हैं की इस ज़िन्दगी में, एक नई ज़िन्दगी मिल जाये तो बात कुछ और हो

अनु की कलम से…

ना कोइ दीन से रिश्ता है ना रात से रिश्ता है, हर किसी का दुनिया मे हालत से रिश्ता है.चहरो की हकीकत की तहे खोल के देखा ये, की लोगों की हंसी का भी सदमात से रिश्ता है. सूखे हुए दरिया से एक नाव लगी कहने, अपना भी ना जाने किस बात से रिश्ता है. बेबस खामोश पलकों की कतरो का भी, सपनों से नहीं आंसुओ से रिश्ता है. इधर से बन रहा हूं, उधर से ढह रहा हूं, रेत के खरोंदे का जो समंदर से रिश्ता है. खोद आया था जिस पेड़ पर नाम तूम्हारा, इस बरस उस पेड़ का वीरानियों से रिश्ता है. ये एक बादल का टुकड़ा कँहा कँहा बरसे, सारे धरती का ही प्यास से रिश्ता है. हसने वालों को नज़र नहीं आते मेरे आंसू, की इस एक कतरे का समंदर से रिश्ता है.

अनु की कलम से…

         मौन है दुनिया की, शायद उसके पास सवालों का जवाब नहीं. चोलो पूछते हैं यही सवाल हवाओं  से, की इन्हे किसी का डर नहीं. जबाब में बेधड़क हवाओं ने कहा, पूछते हो सावल क्या ज़माने का डर नहीं. हमने कहा ज़माने से तो टकरा लेंगे, की अब ज़माने में वो ताकत नहीं. हवाओं ने कहा यही फितरत हैं ज़माने की, बह जाते हैँ हवा संग, हवा के खिलाफ बहने की इनमे हिम्मत नहीं.

अनु की कलम से…

पल भर की ही बात है ये, तुम घर से निकले थे यंहा आने को. ठीक से त्तुम्हे सुना भी नहीं, की वक़्त हो चला जाने को. पलकों की चिलमन से नज़रे उठी ही थीं, तुम दूर जा चुके थे ओझल होने को. हाँथ बढ़या था तुम्हे चुने के लिए , की अब याद ही रह गया रुलाने को. कैसा ये अहसास है ये, तुम्हारे सिवा दूजा नहीं दिल बहलाने को.
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