उत्तराखंड के वीरान होते गांवों में पलायन का दर्द, घायल वृद्धा को अस्पताल पहुंचाने के लिए बमुश्किल मिले कंधे…

 पहाड़ में पलायन का दर्द और बुनियादी सुविधाओं का अभाव किस कदर जानलेवा बन चुका है, इसका जीता-जागता उदाहरण गणाईगंगोली तहसील का पभ्या गांव है।

रोजगार और सुविधाओं की तलाश में गांवों से युवाओं का इस कदर पलायन हुआ है कि अब संकट के समय बीमार और घायलों को अस्पताल पहुंचाने के लिए चार कंधे तक नसीब नहीं हो रहे हैं। पभ्या गांव की एक 70 वर्षीय घायल वृद्धा की जान भी तब आफत में पड़ गई, जब उन्हें डोली में ले जाने के लिए गांव में पर्याप्त युवा ही नहीं मिले।

गांव में सन्नाटा

गणाईगंगोली से तीन किमी दूर सड़क विहीन पभ्या गांव निवासी 70 वर्षीय भागीरथी देवी बारिश के दौरान पैर फिसलने से गंभीर रूप से घायल हो गईं। उनके पति सेना से रिटायर्ड सूबेदार मेजर स्व. प्रयाग सिंह का 18 वर्ष पूर्व ही निधन हो चुका है और वह घर में बिल्कुल अकेली रहती हैं। दर्द से तड़पती वृद्धा को अस्पताल ले जाने की बारी आई तो खाली हो चुके गांव में सन्नाटा पसरा था। ऐसे

मुश्किल वक्त में केशर डोबाल और मनोज डोबाल ने मोर्चा संभाला। इन युवाओं ने हिम्मत बांधी और डोली के सहारे भारी बारिश और फिसलन भरे उबड़-खाबड़ रास्ते पर तीन किलोमीटर की जोखिम भरी दूरी तय कर वृद्धा को मुख्य मार्ग तक पहुंचाया। वहां से उन्हें बेरीनाग अस्पताल ले जाया गया। वर्तमान में वृद्धा की बेटी सुनीता रावत उन्हें इलाज के लिए अपने घर बेरीनाग ले गई हैं, जहां उनकी देखरेख हो रही है। घायल महिला का पुत्र चंडीगढ़ में नौकरी करता है और अपने बच्चों सहित चंडीगढ़ में है।

पलायन से वीरान हो रहे पभ्या और समीपवर्ती गांव

यह घटना पहाड़ की इस त्रासदी को बयां करती है कि कैसे हंसते-खेलते गांव अब बुनियादी सुविधाओं के अभाव में खंडहरों में तब्दील हो रहे हैं। करीब एक दशक पूर्व पभ्या में 90 आबाद परिवार थे, जो अब सिमटकर बमुश्किल 30 रह गए हैं। गांव में युवा न के बराबर हैं।

चार साल पहले छात्र संख्या शून्य होने पर प्राथमिक विद्यालय भी बंद हो चुका है। कमोबेश यही स्थिति समीपवर्ती मासी और आस-पास के अन्य तोक गांवों की भी है। सड़क, स्वास्थ्य और पेयजल जैसी सुविधाओं के घोर अभाव में इन गांवों से भी बड़े पैमाने पर पलायन हुआ है। अधिकांश घरों में ताले लटक गए हैं और जो बचे हैं, वहां केवल बुजुर्ग ही संघर्षपूर्ण जीवन काट रहे हैं।

सिस्टम की अनदेखी और कोरे आश्वासन

ग्राम प्रधान चंदन डोबाल का कहना है कि सड़क के लिए अनगिनत बार शासन-प्रशासन से गुहार लगाई गई, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। मासी व पभ्या गांव के लोग 25 साल से सड़क और पेयजल की बाट जोह रहे हैं, लेकिन उनकी पीड़ा विभागीय फाइलों में दबी है।

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