सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अगर सरकार, पीड़ित या शिकायतकर्ता की ओर से कोई अपील नहीं की गई है, तो अपीलीय अदालत किसी दोषी की सजा खुद नहीं बढ़ा सकती। ऐसा करने से दोषी की स्थिति अपील दायर करने से पहले की तुलना में और खराब हो जाएगी।
शीर्ष अदालत ने यह अहम टिप्पणी एक तिहरे हत्याकांड में की, जिसमें कालीकट विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति, उनकी पत्नी और उनके सुरक्षा गार्ड की हत्या कर दी गई थी।
जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने मद्रास हाई कोर्ट के उस आदेश को रद कर दिया, जिसमें इस मामले में सह-दोषी गोपी की सजा को ‘आजीवन कारावास’ से बदलकर ‘शेष जीवन का कारावास’ कर दिया गया था।
‘आजीवन कारावास’ का मतलब दोषी की जैविक जीवन के बाकी समय की सजा है, लेकिन छूट के जरिये इसकी अवधि कम की जा सकती है।
सीआरपीसी की धारा 433ए के अनुसार, ऐसे मामलों में जेल में 14 वर्ष बिताने के बाद ही ऐसी छूट दी जा सकती है। जबकि ‘शेष जीवन का कारावास’ का मतलब है कि समय से पहले रिहाई या सजा में कमी की कोई गुंजाइश नहीं है।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, पूर्व कुलपति मलिक मोहम्मद के ड्राइवर अंबरसु नामक व्यक्ति को धोखाधड़ी में पकड़े जाने के बाद नौकरी से निकाल दिया गया था।
बदला लेने के लिए उसने गोपी के साथ मिलकर वाचमैन ज्ञानप्रकाशम की हत्या की और घर में घुसकर मोहम्मद की भी हत्या कर दी। वे उनकी पत्नी खतीजा बीबी को कार में बिठाकर तमिलनाडु के विल्लुपुरम जिले के ओंगूर गांव ले गए और पेट्रोल-डीजल छिड़कर जिंदा जला दिया था। z
14 नवंबर, 2007 को उनका आंशिक रूप से जला हुआ शव मिला था। ट्रायल कोर्ट ने अंबरसु को मौत की सजा और गोपी को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। लेकिन हाई कोर्ट ने स्वत: संज्ञान लेकर गोपी की सजा को ‘शेष जीवन का कारावास’ कर दिया था।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि हाई कोर्ट ने गोपी की सजा बढ़ाने के लिए अपने अधिकार का गलत इस्तेमाल किया। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि हाई कोर्ट ने सजाओं को एक के बाद एक चलाने का आदेश देकर गलती की थी। सजाएं एक साथ चलेंगी।