RSS, चीन और PM मोदी से जुड़े मुद्दे… सोनिया गांधी की किताब के प्रकाशन को लेकर क्यों छिड़ा विवाद?…

कांग्रेस नेता सोनिया गांधी की प्रस्तावित किताब ‘बिलांगिंग: अ जर्नी ऑफ लव’ के भारत में प्रकाशन का विवाद गहराता जा रहा है। पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया ने किताब प्रकाशित न करने का फैसला लिया है। कांग्रेस सूत्रों के अनुसार, किताब में तीन प्रमुख मुद्दों से जुड़े अंश विवाद का केंद्र बने।

ये तीन मुद्दे हैं

  • पहला– चीन की सीमा पर अतिक्रमण: किताब में भारतीय सीमा पर चीनी घुसपैठ और मौजूदा सीमा स्थिति का जिक्र है। जिसमें कहा गया है कि संसद में इस मुद्दे को लगातार राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी द्वारा उठाया गया लेकिन इस पर कोई ध्यान नहीं दिया गया।
  • दूसरा– पीएम मोदी का नेतृत्व और केंद्र सरकार की नीतियां: सोनिया गांधी ने मोदी के कार्यशैली और कई प्रमुख नीतियों पर सवाल उठाए हैं।
  • तीसरा- आरएसएस की भूमिका: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के राष्ट्रीय मामलों और सामाजिक ढांचे पर प्रभाव को लेकर उनके विचार शामिल हैं। 

किताब में लिखा गया है कि आरएसएस एक सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की मातृ संस्था है और वह संगठन है जिसमें मोदी ने पूर्णकालिक राजनीति में आने से पहले काम किया था।

पेंगुइन इंडिया ने कुछ अंशों में बदलाव या हटाने का सुझाव दिया था, लेकिन सोनिया गांधी ने इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि किताब के तथ्य और विचार उनके निजी अनुभव और नजरिए पर आधारित हैं, इसलिए बदलाव संभव नहीं।

पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया ने बयान में कहा कि वह कभी इस किताब की प्रकाशक नहीं रही। कंपनी के अनुसार, फैक्ट चेक करना और लेखकों को सुझाव देना प्रकाशन प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा है। कंपनी ने दावा किया कि वह किताब प्रकाशित करने के लिए इच्छुक थी।

पेंगुइन ने जारी किया बयान

पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया (पीआरएचआइ) ने शुक्रवार को स्पष्ट किया कि वह इस संस्मरण का भारत में प्रकाशन नहीं कर रहा है। यह बयान उसके अमेरिकी सहयोगी प्रकाशन संस्थान अल्फ्रेड ए. नोफ के 18 अगस्त के उस एलान के कुछ सप्ताह बाद आया है, जिसमें किताब को 10 नवंबर को जारी किए जाने की जानकारी दी गई थी।

पीआरएचआइ ने कहा कि वह भारत में ‘बिलांगिंग’ का प्रकाशक नहीं है। साथ ही, यह धारणा भी सही नहीं है कि उसके द्वारा सुझाए गए संपादकीय बदलावों को लेखिका द्वारा स्वीकार करने से इनकार के कारण किताब प्रकाशित करने का फैसला बदला है। प्रकाशक ने कहा कि वह किताब के प्रकाशन को लेकर इच्छुक और गंभीर था। लेखकों की पांडुलिपियों का तथ्य-जांच करना और जरूरी सुझाव देना प्रकाशन प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा है।

प्रकाशक ने कहा कि लेखिका के साथ हुई गोपनीय बातचीत पर वह कोई टिप्पणी नहीं करेगा। हालांकि, भारत में किताब के वितरण की स्थिति अभी स्पष्ट नहीं है। अमेजोन पर इसका ई-बुक संस्करण 2,615 रुपये में प्री-आर्डर के लिए उपलब्ध दिख रहा है। वेबसाइट के मुताबिक, ई-बुक हार्परकोलिन्स यूके के इम्प्रिंट विलियम कोलिन्स से प्रकाशित होगी।

कांग्रेस ने साधा निशाना

कांग्रेस नेताओं ने पीआरएचआइ के बयान की कड़ी आलोचना की है। राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने एक्स पर कहा कि आखिर ऐसी क्या वजह या दबाव है, जो भारत में उस किताब को प्रकाशित करने से रोकता है जिसे दुनिया के अन्य हिस्सों में प्रकाशित किया जा रहा है। उन्होंने इसे अभिव्यक्ति की आजादी की हत्या जैसा बताया।

पूर्व केंद्रीय मंत्री कमलनाथ ने भी प्रकाशन से जुड़े फैसले को गंभीर चिंता का विषय बताया। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या अब प्रकाशक यह तय करेंगे कि सोनिया गांधी जैसी शख्सियत क्या लिखें और क्या नहीं। कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई, सेवादल प्रमुख श्रीनिवास बीवी और महिला कांग्रेस अध्यक्ष अल्का लांबा ने भी प्रकाशक की आलोचना की।

इससे पहले जून में पीआरएचआइ ने पत्रकार और लेखक जो सैको की 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों पर आधारित ग्राफिक नावेल के प्रकाशन का फैसला वापस लिया था। फरवरी में पूर्व सेना प्रमुख जनरल एमएम नरवणे की किताब फोर स्टार्स आफ डेस्टिनी को लेकर भी प्रकाशक चर्चा में रहा था।

भाजपा ने साधा निशाना

भाजपा ने भी दी प्रतिक्रिया भाजपा आइटी सेल के पूर्व प्रमुख अमित मालवीय ने पेंगुइन के पक्ष पर प्रतिक्रिया देते हुए एक्स पर कहा कि ये भी अद्भुत है कि पेंगुइन इंडिया को सोनिया गांधी के संस्मरण के फैक्ट चेक की जरूरत महसूस हुई, जिसकी लेखिका स्वयं सोनिया गांधी हैं। इससे स्वाभाविक सवाल उठता है कि प्रकाशन को किस चीज के फैक्ट-चेक की जरूरत पड़ी, लेखिका की याद्दाश्त की या तथ्य और कल्पना के बीच की धुंधली रेखा की?

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