देश के डिजिटल भुगतान तंत्र को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर और सुदृढ़ बनाने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए संसद की एक समिति ने कड़ा रुख अपनाया है।
वित्तीय मामलों की स्थायी समिति ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया है कि भुगतान पारिस्थितिकी तंत्र (पेमेंट्स इकोसिस्टम) को लंबे समय तक बिना सरकारी बैसाखियों के चलाने के लिए उच्च मूल्य के डिजिटल लेन-देन पर चरणबद्ध तरीके से मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) को शीघ्र लागू किया जाना बेहद जरूरी है।
उच्च मूल्य के डिजिटल लेनदेन पर MDR लगाने की सिफारिश
एमडीआर वह शुल्क है जो दुकानदार या व्यापारी द्वारा डिजिटल भुगतान स्वीकार करने पर बैंक या पेमेंट प्रोसेसर को दिया जाता है।
यह शुल्क आमतौर पर कुल लेनदेन राशि का एक से तीन प्रतिशत तक होता है, जिसे ग्राहक को नहीं बल्कि दुकानदार को चुकाना पड़ता है। बहरहाल, समिति का मानना है कि वर्तमान में जीरो-एमडीआर नीति के कारण सरकार पर वित्तीय बोझ लगातार बढ़ रहा है।
रिपोर्ट के अनुसार, रूपे डेबिट कार्ड और कम मूल्य वाले भीम-यूपीआइ लेन-देन के नुकसान की भरपाई के लिए दिए जाने वाले दो हजार करोड़ रुपये के बजटीय आवंटन से मंत्रालय की अनुदान मांग अनावश्यक रूप से बढ़ जाती है, जबकि यह राशि उद्योग की कुल 20,700 करोड़ रुपये की वास्तविक परिचालन लागत का मात्र 10 प्रतिशत ही कवर कर पाती है।
समिति ने चिंता जताई है कि यदि इस वित्तीय अंतर को जल्द नहीं पाटा गया, तो साइबर सुरक्षा, धोखाधड़ी रोकथाम और नेटवर्क बुनियादी ढांचे जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में होने वाले आवश्यक निवेश खतरे में पड़ सकते हैं।
छोटे व्यापारियों और P2P ट्रांसफर को सुरक्षित रखा जाएगा
समिति ने रेखांकित किया है कि भुगतान सेवा प्रदाताओं को पर्याप्त सब्सिडी न मिलने से वे लगातार संघर्ष कर रहे हैं। वरिष्ठ भाजपा नेता भर्तृहरि महताब की अध्यक्षता वाली इस समिति ने जोर देकर कहा है कि छोटे व्यापारियों और पीटूपी (व्यक्ति से व्यक्ति) ट्रांसफर को पूरी तरह सुरक्षित रखते हुए केवल बड़े लेन-देन पर एक पारदर्शी और स्तरीकृत (टियर्ड) राजस्व माडल अपनाया जाना चाहिए।
उल्लेखनीय है कि इस दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए संसद ने हाल ही में ‘भुगतान और निपटान प्रणाली अधिनियम, 2007’ और ‘आयकर अधिनियम’ में संशोधन करने वाले एक विधेयक को मंजूरी दी है। इस संशोधन के बाद अब सरकार और अधिकृत बैंक यूपीआइ तथा अन्य इलेक्ट्रानिक माध्यमों से होने वाले भुगतान पर शुल्क वसूलने के कानूनी रास्ते पर आगे बढ़ चुके हैं।
इस बदलाव का मुख्य उद्देश्य देश के डिजिटल पेमेंट नेटवर्क को वित्तीय रूप से स्वतंत्र बनाना है, जिससे आम नागरिकों और छोटे कारोबारियों पर बिना अतिरिक्त दबाव डाले बैंकों और फिनटेक कंपनियों को दीर्घकालिक स्थिरता मिल सके।