28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल ने ईरान के खिलाफ व्यापक सैन्य अभियान ऑपरेशन रोअरिंग लायन शुरू किया। दुनिया भर के समाचार चैनलों पर ईरान के सैन्य, परमाणु और सरकारी ठिकानों पर मिसाइल हमलों के फुटेज प्रसारित हो रहे थे।
हालांकि, इस भौतिक हमले के समानांतर एक और युद्ध लड़ा जा रहा था, जिसमें न तो आसमान में लड़ाकू विमान थे और न ही मिसाइलें। समन्वित साइबर हमलों ने ईरान के डिजिटल नेटवर्क को ध्वस्त कर दिया, समाचार प्लेटफॉर्मों और एक लोकप्रिय प्रार्थना एप को हैक कर लिया गया, संचार व्यवस्था बाधित की गई।
सरकारी टीवी प्रसारण को रोककर डोनल्ड ट्रंप तथा बेंजामिन नेतन्याहू के संदेश दिखाए जाने लगे। यह आधुनिक डिजिटल युद्ध की एक नई झलक थी, जिसके जवाब में ईरान ने भी साइबर पलटवार किया।
अमेरिकी बुनियादी ढांचे पर को बनाया निशाना
ईरानी साइबर ऑपरेटरों और उनसे जुड़े समूहों ने अमेरिकी और इजरायली प्रणालियों को निशाना बनाते हुए संवेदनशील डेटा चुराया और बुनियादी ढांचे में बाधा उत्पन्न की। जुलाई में हुए साइबर हमलों ने मिनेसोटा राज्य की 30 से अधिक प्रणालियों सहित अमेरिका के कम से कम 12 राज्यों में जल एवं अपशिष्ट जल सुविधाओं को प्रभावित किया।
हालांकि, अमेरिकी अधिकारियों ने औपचारिक रूप से तेहरान को सीधे जिम्मेदार नहीं ठहराया है, लेकिन इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स से जुड़े समूह साइबरअवेंजर्स और उनके सहयोगी एपीटी ईरान ने टेलीग्राम पर मिनेसोटा हमले की जिम्मेदारी ली।
उन्होंने चेतावनी दी कि अमेरिका का बिजली, दूरसंचार और जल ढांचा उनके निशाने पर है और ईरान पर हमला करने की भारी कीमत चुकानी होगी।
मनोवैज्ञानिक रणनीति के साथ डिजिटल हमला
2026 के हमलों के शुरुआती घंटों में ही कई ईरानी समाचार एजेंसियों के नेटवर्क में सेंध लगा दी गई। फर्जी खबरें डालकर समर्थकों का मनोबल गिराने का प्रयास किया गया। इसके तुरंत बाद, 3 करोड़ से अधिक उपयोगकर्ताओं वाले ईरानी प्रार्थना ऐप बादेसबा को हैक करके सेना के जवानों को आत्मसमर्पण करने के पुश नोटिफिकेशन भेजे गए।
हमले के दूसरे दिन ईरानी राष्ट्रीय टेलीविजन चैनल 3 की सैटेलाइट स्ट्रीम हैक करके ट्रंप और नेतन्याहू के भाषण दिखाए गए। इसके जवाब में ईरान ने देश भर में इंटरनेट ब्लैकआउट लागू कर दिया ताकि असंतोष और सूचना के प्रसार को नियंत्रित किया जा सके।
ईरान के पलटवार का दिखा वैश्विक स्तर पर असर
युद्ध शुरू होने के 24 घंटों के भीतर इजरायल पर साइबर हमलों में 3.5 गुना वृद्धि दर्ज की गई। इसके अलावा, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत और सऊदी अरब जैसे खाड़ी देश भी पहली बार सबसे ज्यादा लक्षित देशों की सूची में शामिल हो गए।
179 साइबर घटनाओं के विश्लेषण से पता चला कि 37% हमले डिनायल-ऑफ-सर्विस थे। इसके साथ ही, अमेरिकी बुनियादी ढांचे की नियंत्रण प्रणालियों और सुरक्षा कैमरों में भी सेंधमारी की गई।
साइबर संघर्ष का एक दशक लंबा इतिहास
यह अदृश्य युद्ध अचानक शुरू नहीं हुआ था। इसकी जड़ें 2010 के स्टक्सनेट साइबर हथियार से जुड़ी हैं, जिसने ईरान के नतांज परमाणु संयंत्र को प्रभावित किया था। इसके जवाब में ईरान ने अपनी डिजिटल क्षमता बढ़ाई और 2012 में अमेरिकी बैंकों पर ऑपरेशन अबाबील तथा सऊदी अरामको पर शामून हमला किया।
2013 से 2017 के दौरान मबना इंस्टीट्यूट ने 144 अमेरिकी विश्वविद्यालयों के नेटवर्क से डेटा चुराया। जून 2025 के 12-दिवसीय युद्ध के दौरान भी साइबर हमलों में भारी उछाल आया था, जिससे तेहरान इस संघर्ष के लिए पूरी तरह तैयार था।
स्वास्थ्य सेवा कंपनी स्ट्राइकर पर हमला
11 मार्च को अमेरिकी मेडिकल उपकरण निर्माता कंपनी स्ट्राइकर पर बड़ा साइबर हमला हुआ, जिससे उसकी वैश्विक कार्यप्रणाली प्रभावित हुई। ईरान से जुड़े ‘हंदाला’ हैकिंग समूह ने इस हमले का दावा किया।
हालांकि स्ट्राइकर हथियार नहीं बनाती, लेकिन यह अस्पतालों को महत्वपूर्ण चिकित्सा उपकरण सप्लाई करती है। स्वास्थ्य सेवा की आपूर्ति श्रृंखला को बाधित करके अप्रत्यक्ष दबाव बनाना आधुनिक साइबर युद्ध रणनीति का खतरनाक पहलू बन चुका है।
जल प्रणालियों की सुरक्षा पर मंडराता संकट
अमेरिकी सुरक्षा एजेंसियों ने चेतावनी जारी की कि ईरानी हैकर्स औद्योगिक कंप्यूटरों यानी प्रोग्रामेबल लॉजिक कंट्रोलर्स (PLCs) को निशाना बना रहे हैं। मिनेसोटा की 30 से अधिक जल प्रणालियों में स्वचालित नियंत्रण बाधित हो गया, जिससे ऑपरेटरों को मैनुअल सिस्टम अपनाना पड़ा।
रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिका भर में कम से कम 100 सुविधाओं को निशाना बनाया गया है। यद्यपि ये हमले विनाशकारी नहीं थे, लेकिन इन्होंने यह साबित कर दिया कि एक साइबर हमला पंप बंद होने या सिस्टम ऑफलाइन होने तक अदृश्य रहकर भी बड़ा असर डाल सकता है।
SS7 प्रोटोकॉल का उठाया फायदा
ईरानी साइबर रणनीति का एक और पहलू मोबाइल नेटवर्क के पुराने सिग्नलिंग प्रोटोकॉल SS7 की कमियों का फायदा उठाना है।
जुलाई की रिपोर्टों के अनुसार, ईरानी हैकर्स ने दूरसंचार बुनियादी ढांचे और विज्ञापन तकनीक का उपयोग करके इराक और बहरीन में तैनात अमेरिकी सैन्य कर्मियों की सटीक लोकेशन ट्रैक की। इससे स्पष्ट होता है कि बिना किसी फोन को हैक किए भी केवल नेटवर्क डेटा के जरिए जासूसी की जा सकती है।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का बढ़ता इस्तेमाल
ईरान की साइबर रणनीति अमेरिका और इजरायल की पारंपरिक सैन्य श्रेष्ठता के मुकाबले असममित युद्ध पर आधारित है। इसका मुख्य उद्देश्य भारी भौतिक नुकसान पहुँचाने से अधिक अनिश्चितता, मनोवैज्ञानिक दबाव और राजनीतिक उथल-पुथल पैदा करना है।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का इस्तेमाल जासूसी, मालवेयर कोड विकास और फर्जी सामग्री तैयार करने में किया जा रहा है। जैसे-जैसे 2026 के अमेरिकी मध्यावधि चुनाव करीब आ रहे हैं, यह चुनौती बुनियादी ढांचे के साथ-साथ पूरी राजनीतिक व्यवस्था के लिए गंभीर रूप ले रही है।