विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने रविवार को इबोला के प्रकोप को लेकर सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल की घोषणा कर दी। यह घोषणा तब की गई जब कांगो और युगांडा में 300 से ज्यादा संदिग्ध मामले और 88 मौतें सामने आईं।
एक्स पर एक पोस्ट में WHO ने बताया कि कांगो की राजधानी किनशासा में भी एक लैब-पुष्टि वाला मामला सामने आया है। किनशासा प्रकोप के केंद्र यानी पूर्वी प्रांत इटुरी से लगभग 1,000 किलोमीटर (620 मील) दूर है। इससे बीमारी के और ज्यादा फैलने की आशंका बढ़ गई है।
‘बंद नहीं करनी चाहिए देश की सीमाएं’
संगठन ने इस बात पर जोर दिया कि जिन देशों की जमीनी सीमा प्रभावित देशों से नहीं मिलती, उन्हें अपनी सीमाएं बंद नहीं करनी चाहिए और न ही यात्रा या व्यापार पर कोई पाबंदी लगानी चाहिए।
WHO ने कहा, “किसी भी देश को अपनी सीमाएं बंद नहीं करनी चाहिए, न ही यात्रा और व्यापार पर कोई पाबंदी लगानी चाहिए। ऐसे कदम आमतौर पर डर की वजह से उठाए जाते हैं और इनका विज्ञान से कोई लेना-देना नहीं होता। ये कदम लोगों और सामान की आवाजाही को उन अनौपचारिक सीमा चौकियों की ओर मोड़ देते हैं, जहां कोई निगरानी नहीं होती; जिससे बीमारी फैलने का खतरा और भी बढ़ जाता है।”
संगठन ने आगे कहा, “सबसे अहम बात यह है कि ये पाबंदियां स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं को भी नुकसान पहुंचा सकती हैं और सुरक्षा व लॉजिस्टिक्स के नजरिए से राहत कार्यों पर भी बुरा असर डाल सकती हैं।”
भारत को कितना खतरा?
हालांकि, भारतीय विशेषज्ञों का कहना है कि घबराने की कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि इबोला कोविड-19 की तरह नहीं फैलता। फिर भी, सतर्कता बरतना और बीमारी का जल्द पता लगाना बेहद जरूरी है।
भारत के लिए इबोला कितनी बड़ी चिंता का विषय है?
- स्वास्थ्य मंत्रालय ने बताया कि नेशनल सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल (NCDC) इस स्थिति पर बारीकी से नजर रखे हुए है। यह भी कहा गया कि भारत में अब तक इबोला का कोई मामला सामने नहीं आया है, सिवाय एक अंतरराष्ट्रीय यात्री के जिसका 2014 में टेस्ट पॉजिटिव आया था।
- एम्स के पूर्व डायरेक्टर डॉ. रणदीप गुलेरिया ने कहा कि इबोला संक्रमित शरीर के तरल पदार्थों, जैसे खून, उल्टी, स्राव या दूषित चीजों के सीधे संपर्क में आने से फैलता है। यह कोविड-19 से अलग है, जो बड़े पैमाने पर फैलता है।
- गुलेरिया ने कहा, “घबराने की कोई जरूरत नहीं है।” उन्होंने समझाया कि इबोला फैलने के लिए करीबी शारीरिक संपर्क जरूरी होता है और इसलिए इसके Covid-19 जैसी वैश्विक महामारी का रूप लेने की संभावना बहुत कम है।
- 2014 में इबोला फैलने के दौरान भारत की तैयारियों को याद करते हुए उन्होंने कहा कि अधिकारियों ने पूरे देश में स्क्रीनिंग अभियान और वर्कशॉप आयोजित किए थे। उन्होंने सिएरा लियोन से लौटे एक भारतीय यात्री के मामले का भी जिक्र किया, जिसे इबोला से ठीक होने के बाद दिल्ली में आइसोलेट किया गया था क्योंकि उसके शरीर के तरल पदार्थों के सैंपल में लगातार वायरल कण पाए जा रहे थे।
- एहतियात के तौर पर वह यात्री लगभग तीन महीने तक आइसोलेशन में रहा। हालांकि उसके बाद संक्रमण फैलने का कोई और मामला सामने नहीं आया। गुलेरिया ने कहा कि इबोला का फैलना अक्सर संक्रमित चमगादड़ों या जंगली जानवरों से जुड़ा होता है और यह संक्रमित शवों को छूने से भी फैल सकता है।
- उन्होंने जोर देकर कहा कि प्रभावित इलाकों से आने वाले यात्रियों की स्क्रीनिंग करना और वायरस के 21 दिनों तक के इन्क्यूबेशन पीरियड (संक्रमण के लक्षण दिखने से पहले का समय) के दौरान उन पर नजर रखना बेहद जरूरी है।
- विशेषज्ञों ने कहा कि भारत के पास इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) और NCDC द्वारा संचालित विशेष RT-PCR टेस्टिंग सुविधाओं के जरिए इबोला का तेजी से पता लगाने के लिए जरूरी लैबोरेटरी इंफ्रास्ट्रक्चर मौजूद है।
- हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि किसी भी बीमारी के फैलने पर उसे रोकने के लिए शुरुआती क्लिनिकल शक और तुरंत रिपोर्ट करना बहुत जरूरी है।
- एम्स में मेडिसिन के प्रोफेसर डॉ. नीरज निश्चल ने कहा, “कुल मिलाकर खतरा कम ही है, लेकिन आज की आपस में जुड़ी दुनिया में संक्रामक बीमारियों का फैलना सचमुच बस एक हवाई यात्रा की दूरी पर है।” उन्होंने हवाई अड्डों पर निगरानी, यात्रा के दौरान जांच और आपातकालीन प्रतिक्रिया प्रणालियों के महत्व पर जोर दिया।
- उन्होंने बताया कि इबोला के मरीज आमतौर पर लक्षण दिखने के बाद ही संक्रामक होते हैं। खासकर जब उन्हें बुखार, उल्टी, दस्त या खून बहने की समस्या हो। निश्चल ने आगे कहा कि इबोला के शुरुआती लक्षण अक्सर दूसरी वायरल बीमारियों जैसे ही होते हैं, इसलिए बीमारी का पता लगाने के लिए यात्रा और संपर्क के इतिहास की जानकारी बहुत जरूरी हो जाती है।
इबोला के लक्षण
इबोला के इन्फेक्शन में इन्क्यूबेशन पीरियड यानी वायरस के संपर्क में आने और बीमारी के लक्षण दिखाई देने के बीच का समय आमतौर पर 2 से 21 दिनों का होता है।
यह बीमारी आमतौर पर अचानक शुरू होती है, जिसमें बुखार, थकान, कमजोरी, मांसपेशियों में दर्द, सिरदर्द और गले में खराश जैसे लक्षण दिखाई देते हैं।
जैसे-जैसे बीमारी बढ़ती है मरीजों को उल्टी, दस्त, पेट दर्द, त्वचा पर चकत्ते और किडनी या लिवर के ठीक से काम न करने के लक्षण हो सकते हैं।
गंभीर मामलों में शरीर के अंदर और बाहर खून बह सकता है। इसमें उल्टी या मल में खून आना और नाक, मसूड़ों या योनि से खून बहना शामिल है।
जो लोग इबोला से ठीक हो जाते हैं उन्हें लंबे समय तक सेहत से जुड़ी परेशानियां हो सकती हैं। इनमें लगातार थकान, सिरदर्द, मांसपेशियों और जोड़ों में दर्द, आंखों से जुड़ी समस्याएं (जैसे धुंधला दिखाई देना, आंखों में दर्द या रोशनी के प्रति संवेदनशीलता), साथ ही पेट दर्द, भूख कम लगना और वजन में बदलाव शामिल हैं।