PMLA मामलों में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, बोला- आरोपी को सुनवाई का पूरा अधिकार; ED को झटका…

सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए साफ किया है कि मनी लॉन्ड्रिंग (PMLA) के मामलों में भी किसी आरोपी को निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी भी मनी लॉन्ड्रिंग मामले का संज्ञान (Cognizance) लेने से पहले अदालत के लिए आरोपी का पक्ष सुनना अनिवार्य होगा।

सुप्रीम कोर्ट ने प्रवर्तन निदेशालय (ED) की उस दलील को सिरे से खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि PMLA एक विशेष और स्वतंत्र कानून है, इसलिए इस पर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS या पूर्ववर्ती CrPC) के सामान्य नियम लागू नहीं होते।

जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस एनके सिंह की पीठ ने कहा कि निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत हर नागरिक का मौलिक अधिकार है। इसे PMLA जैसे कड़े कानून के तहत भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि कोई कोर्ट आरोपी को बिना सुने किसी मामले का संज्ञान लेती है, तो वह कानूनी प्रक्रिया शुरुआत से ही अमान्य (शून्य) मानी जाएगी।

सुप्रीम कोर्ट ने 20 मई को ईडी के इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि आरोपियों को सुनवाई न होने के कारण हुए पूर्वाग्रह को साबित करना होगा। कोर्ट ने स्पष्ट किया, “बीएनएसएस पूर्ववर्ती सीआरपीसी का एक उन्नत संस्करण है।

यह एक प्रक्रिया संहिता है जिसे आपराधिक न्याय प्रणाली के सभी हितधारकों के लिए एक मार्गदर्शक ढांचे के रूप में कार्य करने के लिए डिजाइन किया गया है।

पूर्ववर्ती कानून में निहित कई प्रावधानों को बरकरार रखते हुए, बीएनएसएस को नागरिक-केंद्रित बनाने का सचेत प्रयास किया गया है, साथ ही जांच एजेंसियों और न्यायालयों को सुविधा प्रदान करने का भी प्रयास किया गया है।”

कानून की अनदेखी नहीं की जा सकती

अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) एसवी राजू ने दलील दी थी कि PMLA के तहत बनी विशेष अदालतों को BNSS (या पुराने CrPC) की सामान्य आपराधिक प्रक्रियाओं को मानने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। इस पर अदालत ने सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि आरोपी को निष्पक्ष सुनवाई देने वाले किसी भी कानून की अनदेखी नहीं की जा सकती।

ED की शिकायत से जुड़ा मामला

यह मामला प्रवर्तन निदेशालय (ED) की एक शिकायत से जुड़ा है, जो 24 जून, 2024 को PMLA की धारा 44 और 45 के तहत दायर की गई। हालांकि, शिकायत BNSS के 1 जुलाई, 2024 को लागू होने से पहले दायर की गई, लेकिन स्पेशल कोर्ट ने असल में 2 जुलाई, 2024 को ही संज्ञान लिया, जब CrPC रद्द हो चुकी थी और उसकी जगह BNSS लागू हो गई। अहम बात यह है कि संज्ञान लेने से पहले आरोपी को सुनवाई का कोई मौका नहीं दिया गया। हाईकोर्ट ने भी इस फैसले को सही ठहराया था।

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