सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को एक अहम फैसला सुनाते हुए साफ कर दिया कि, अगर कोई व्यक्ति शादी के बाहर किसी रिश्ते में है, तो सिर्फ इस आधार पर उसे आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले में दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में यह साबित करना जरूरी है कि आरोपी ने आत्महत्या के लिए उकसाने में कोई सक्रिय भूमिका निभाई हो।
जस्टिस के.वी. विश्वनाथन और जस्टिस अतुल चंदुरकर की बेंच ने कहा कि भारतीय दंड संहिता की धारा 306 के तहत केस तभी बनता है, जब यह दिखाया जाए कि आरोपी ने जानबूझकर, सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से आत्महत्या के लिए उकसाया हो। मालूम हो कि, यह फैसला छत्तीसगढ़ के एक मामले में आया, जहां एक व्यक्ति पर आरोप था कि उसका मृतक की पत्नी के साथ कथित संबंध था; जिससे परेशान होकर उसके पति ने आत्महत्या कर ली।
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने पलटा
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में आरोपी के खिलाफ चल रही कार्यवाही को रद्द कर दिया और छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के उस आदेश को भी खारिज कर दिया, जिसमें मुकदमा चलाने की अनुमति दी गई थी।
कोर्ट ने साफ कहा कि भले ही अवैध संबंध की बात मान भी ली जाए, लेकिन इसमें आत्महत्या के लिए उकसाने का आपराधिक इरादा नहीं दिखता। बेंच ने यह भी कहा कि ऐसा कोई आरोप नहीं है कि, आरोपी ने सीधे तौर पर आत्महत्या के लिए उकसाया या किसी तरह से मदद की हो।
उकसाने और आत्महत्या के बीच सीधा संबंध जरूरी
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा कि आत्महत्या के लिए उकसाने का मामला साबित करने के लिए आरोपी के किसी सक्रिय कार्य का ठोस सबूत होना जरूरी है। साथ ही, उकसाने और आत्महत्या के बीच एक साफ और नजदीकी संबंध भी होना चाहिए।
कोर्ट ने अभियोजन पक्ष की इस दलील को भी खारिज कर दिया कि पार्टनर की मौजूदगी में हुई बेइज्जती को अपने आप उकसावा माना जा सकता है।
हालांकि, यह राहत सिर्फ उस व्यक्ति को मिली है, क्योंकि मृतक की पत्नी, जो इस केस में दूसरी आरोपी है उसने अपने खिलाफ चल रहे मामले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती नहीं दी थी, इसलिए उसके खिलाफ केस जारी रहेगा।