झारखंड के इस गांव में जीवा प्रोजेक्ट से आई क्रांति: प्राकृतिक खेती से बदली किसानों की किस्मत, फल-सब्जियों की खेती से बढ़…

रांची से करीब 30 किमी दूर पहाड़ों के बीच बसे सांकी पंचायत का कोड़ी गांव में दस साल पहले कोई सोच नहीं सकता था कि परती पड़े जमीन पर कभी खेती कर पैसे भी कमाए जा सकते हैं। लेकिन वहां की मुखिया कोमिला देवी और गांव के लोगों ने मिलकर जब खेती करने की ठानी तो किसी को विश्वास भी नहीं था कि उनकी आय बढ़ जाएगी और गांव से पलायन पूरी तरह से रूक जाएगा।

नाबार्ड के जीवा कार्यक्रम ने उन्हें प्राकृतिक खेती करने के लिए प्रेरित किया। इसमें उनका साथ ग्रामीण सेवा संघ ने दिया। गांव में एक हजार एकड़ में आम-अमरुद के बागान लगे हैं। उसके बीच सब्जियों की खेती की जाती है। जिसमें रसायनिक खाद का बिल्कुल प्रयोग नहीं होता है।

कोमिला देवी कहती हैं कि जब वर्ष 2005 में उनकी शादी कोड़ी गांव के प्रेम कुमार से हुई थी, तो यहां कुछ कमाने का संसाधन नहीं था, सारे लोग कमाने के लिए पलायन को मजबूर थे। वर्ष 2010 में उन्होंने मुखिया का चुनाव लड़ा। गांव के लोगों ने उन्हें भारी मतों से विजयी बनाया। तब उन्होंने गांव की सूरत बदलने की ठानी।

नाबार्ड के जीवा प्रोजेक्ट से मिली फंडिंग

नाबार्ड की ओर से प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए जीवा प्रोजेक्ट चलाया जा रहा है। इसको धरातल पर उतारने के लिए एनजीओ ग्रामीण सेवा संघ (जीएसएस) का सहयोग लिया गया। जीएसएस के पिंटू लाल ने बताया कि यहां किसान मेहनती हैं और उन्होंने अपनी मेहनत से गांव की तस्वीर बदली है। यहां पर 1003 सदस्यों का एफपीओ (किसान उत्पादक संघ) बनाया गया है।

एफपीओ को नाबार्ड से नौ लाख रुपये की राशि दी गई और बाद में पांच लाख रुपये की सहायता की गई। अब गांव के 65 एकड़ में खीरा, भिंडी, लौकी, मकई, नेनुआ और तरबूज की बड़े पैमाने पर खेती की जाती है।

किसान खेती में जीवामृत का प्रयोग करते हैं। जिसे पंच गब्य, गोबर और गुड़ को एक साथ मिलाकर तैयार किया जाता है। किसान देवलाल मुंडा ने बताया कि जीवा के सहयोग से जीवामृत तैयार करने का प्लांट लगाया गया है। जिसमें कुल तीन हजार लीटर जीवामृत तैयार होता है।

रोजाना करीब 200 लीटर जीवामृत निकाल कर खेतों में डाला जाता है। एक एकड़ में उर्वरक इस्तेमाल करने पर 20 से 25 हजार रुपये लगते थे। लेकिन अब मात्र 1500 रुपये में जीवामृत बन जाता है। इससे खेत की उर्वराशक्ति भी बरकरार रहती है और उत्पादन अच्छा होता है।

देसी बीज का करते हैं इस्तेमाल

इस पंचायत में सिर्फ प्राकृतिक खेती ही नहीं, बल्कि देसी बीज से सब्जी का उत्पादन शुरू किया जाता है। इसके लिए पहले गांव में ही बीज मेला लगाया गया और सभी किसानों के उनके पास देसी बीज को लाने के कहा गया था।

यहां पर करीब 50-60 प्रकार के बीज मिले और किसानों में बांटा गया। इस बार 200 एकड़ में तरबूज लगाया गया है। प्रति एकड़ 15 टन तरबूज का उत्पादन भी हो रहा है। ड्रीप एरिगेशन के तहत पानी का दिया जाता है। लोगों ने गांव के पास ही एक बड़ा तालाब बनाया है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *