सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय: दिव्यांगों के लिए आरक्षित ‘अनारक्षित’ पद अब सभी वर्गों के लिए खुल गए…

सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण नियमों पर एक महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण देते हुए कहा है कि दिव्यांग व्यक्तियों (पीडब्ल्यूडी) के लिए निर्धारित ”अनारक्षित” रिक्तियां एक ‘ओपन पूल’ की तरह हैं।

इसमें चयन का मुख्य आधार केवल मेरिट (योग्यता) होगी। कोर्ट के अनुसार, इन सीटों पर किसी भी सामाजिक या विशेष श्रेणी (एससी, एसटी, ओबीसी या जनरल) का पात्र उम्मीदवार नियुक्त किया जा सकता है।

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कलकत्ता हाईकोर्ट के उस फैसले को पलट दिया, जिसमें कम अंक वाले सामान्य श्रेणी के उम्मीदवार को प्राथमिकता दी गई थी।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ”अनारक्षित” श्रेणी कोई अलग सामाजिक वर्ग नहीं है, बल्कि यह सभी के लिए खुला मैदान है।

फैसला लिखते हुए जस्टिस सिंह ने कहा कि आरक्षण कानून में यह पूरी तरह स्थापित है कि अनारक्षित/ओपन श्रेणी किसी विशेष सामाजिक या सामुदायिक श्रेणी (जैसे एससी, एसटी या ओबीसी) को संदर्भित नहीं करती है। यह दुनिया भर के सभी उम्मीदवारों के लिए खुला है, चाहे वे किसी भी सामाजिक या विशेष श्रेणी से संबंधित हों।

यह मामला पश्चिम बंगाल राज्य विद्युत पारेषण कंपनी लिमिटेड में जूनियर इंजीनियर की भर्ती से जुड़ा था। यहां एक सीट ‘अनारक्षित (दिव्यांग-लो विजन)’ के लिए थी।

इसमें एक ओबीसी दिव्यांग उम्मीदवार ने 66.667 अंक प्राप्त किए, जबकि एक सामान्य वर्ग के दिव्यांग उम्मीदवार को 55.667 अंक मिले।

कंपनी ने अधिक मेरिट वाले ओबीसी उम्मीदवार को नियुक्त किया था, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने सही ठहराया। कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि कोई ओबीसी, एससी या एसटी उम्मीदवार अधिक मेधावी है, तो उसे केवल इसलिए अनारक्षित दिव्यांग पद से बाहर नहीं किया जा सकता क्योंकि वहां सामान्य श्रेणी का उम्मीदवार उपलब्ध है।

कोर्ट के अनुसार, समान स्थिति वाले सभी दिव्यांगों के साथ समान व्यवहार होना चाहिए और मेरिट को ही प्राथमिकता मिलनी चाहिए।

सक्षम अधिकारी ही माफ कर सकते हैं कम स्टांप ड्यूटी पर दंड: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कम स्टांप ड्यूटी पर लगने वाले दंड के मामले में एक अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि एक हाई कोर्ट कम स्टांप ड्यूटी पर लगने वाले वैघानिक दंड को माफ नहीं कर सकता। ऐसी शक्ति विशेष रूप से संबंधित स्टांप अधिनियम के तहत सक्षम अधिकारी के पास होती है।

जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के विनोद चंद्रन की पीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कर्नाटक हाई कोर्ट के उस आदेश को रद कर दिया, जिसमें लीज के दस्तावेज पर कम स्टांप ड्यूटी के भुगतान के साथ जुर्माने के भुगतान से छूट दी गई थी।

सर्वोच्च न्यायालय लंबे समय से लंबित एक अपील पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें लीज के दो दस्तावेज की वैधता को अपर्याप्त स्टांप के आधार पर चुनौती दी गई थी। यह अपील 2008 में दाखिल की गई थी।

शीर्ष अदालत ने कहा, ‘हाई कोर्ट स्टांप ड्यूटी के भुगतान का निर्देश नहीं दे सकता और वह उस जुर्माने से छूट भी नहीं दे सकता है, जो कानून के तहत अनिवार्य है।’ इसके साथ ही कोर्ट ने कहा कि कर्नाटक स्टांप अधिनियम के तहत कम शुल्क का निर्धारण और जुर्माना लगाना उपायुक्त के अधिकार क्षेत्र में आता है।

स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति कर्मचारी का विशिष्ट अधिकार : सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति केवल छोड़ने या सेवा समाप्त करने का कार्य नहीं है, बल्कि यह एक कर्मचारी का विशिष्ट अधिकार है, जो आवश्यक सेवा वर्ष पूरे करने पर उपलब्ध होता है।

पीठ ने छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के 2019 के दो अलग-अलग आदेशों को चुनौती देने वाले एक बैंक द्वारा दायर अपीलों पर अपना निर्णय सुनाया।

जस्टिस जेके महेश्वरी और विजय बिश्नोई की पीठ ने कहा, ”यह स्पष्ट है कि यदि कोई कर्मचारी एक नवंबर, 1993 के बाद 20 वर्षों की योग्य सेवा पूरी करता है और नियुक्ति प्राधिकरण को तीन महीने से कम का नोटिस देता है, तो वह स्वैच्छिक रूप से सेवानिवृत्त हो सकता है।”

उच्च न्यायालय ने एक बैंक कर्मचारी को अंतिम लाभ देने के लिए निर्देश जारी किया था, जिसमें कहा गया था कि स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के लिए नोटिस में निर्दिष्ट तीन महीने की नोटिस अवधि पूरी होने के बाद या सेवा में उपस्थित होना बंद करने की तिथि से उसे स्वैच्छिक रूप से सेवानिवृत्त माना जाएगा।

सर्वोच्च अदालत ने उल्लेख किया कि कर्मचारी ने 4 अक्टूबर, 2010 को सामान्य प्रबंधक को स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति का नोटिस भेजा और इसके जवाब में क्षेत्रीय कार्यालय ने पेंशन नियमों के तहत एक नई आवेदन पत्र की मांग की।

बाद में चूंकि स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के लिए नोटिस में निर्दिष्ट अवधि समाप्त हो गई थी, कर्मचारी ने 16 मई, 2011 से बैंक के साथ काम करना बंद कर दिया।

कोर्ट ने कहा कि बैंक के साथ अपनी नौकरी समाप्त करने के लगभग आठ महीने बाद उस व्यक्ति को 5 मार्च, 2012 को संदिग्ध लेनदेन के आरोप में चार्जशीट किया गया। उसने बाद में हाई कोर्ट में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति की अस्वीकृति और जांच की शुरुआत और बर्खास्तगी को चुनौती दी।

पीठ ने कहा कि 29 जून, 2011 को नोटिस अवधि समाप्त होने और काम बंद होने के बाद संप्रेषित अस्वीकृति का कोई महत्व नहीं।

कोर्ट ने कहा,”स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति केवल छोड़ने या सेवा समाप्त करने का कार्य नहीं, बल्कि यह विशिष्ट अधिकार है जो आवश्यक सेवा वर्ष पूरे करने पर उपलब्ध होता है।”

पीठ ने कहा कि चार्जशीट जारी करने और बर्खास्तगी के आदेश के बाद का कार्य भी कानून में उचित नहीं था। हाई कोर्ट के निर्देशानुसार, कर्मचारी सभी संबंधित सेवानिवृत्त लाभों का हकदार होगा। उसने बैंक को तीन महीने में लागू ब्याज के साथ सभी बकाया राशि देने का निर्देश दिया।

केवल सीजेआई की पीठ के समक्ष हो सकेगा अत्यावश्यक मामलों का उल्लेख

सुप्रीम कोर्ट में अब अत्यावश्यक मामलों का उल्लेख केवल धान न्यायाधीश (सीजेआई) की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष किया जा सकेगा।

शीर्ष अदालत ने प्रक्रिया से जुड़े महत्वपूर्ण निर्देश जारी कर कहा है कि अत्यंत आवश्यक मामले, जिनमें सूचीबद्ध होने की प्रक्रिया का इंतजार नहीं किया जा सकता, उनका सिर्फ प्रधान न्यायाधीश (सीजेआइ) के सामने उल्लेख किया जा सकता है, भले ही वह किसी संविधान पीठ की सुनवाई में व्यस्त हों। ऐसे मामलों का उल्लेख किसी अन्य पीठ के सामने करने की इजाजत नहीं है।

सामान्य प्रक्रिया के अनुसार, यदि सीजेआइ अनुपलब्ध हों या संविधान पीठ की अध्यक्षता कर रहे हों, तो अत्यावश्यक मामलों का उल्लेख सुप्रीम कोर्ट के दूसरे वरिष्ठतम न्यायाधीश के समक्ष सूचीबद्ध करने और सुनवाई के लिए उल्लेख किया जाता रहा है।

छह अप्रैल को जारी सर्कुलर में उच्चतम न्यायालय ने कहा, अत्यंत आवश्यक मामलों का उल्लेख, जिनमें अदालत के समक्ष सूचीबद्ध करने का इंतजार नहीं किया जा सकता, उनमें अदालत संख्या 1 (सीजेआइ की अदालत) के समक्ष उल्लेख करने की अनुमति है, भले ही प्रधान न्यायाधीश किसी संविधान पीठ की अध्यक्षता कर रहे हों।

बैंक खातों को फ्राड घोषित करने से पहले कर्जदार निजी सुनवाई के हकदार नहीं : सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि बैंकों की ओर से खातों को ‘फ्रॉड’ घोषित करने से पहले कर्जदार अनिवार्य रूप से व्यक्तिगत सुनवाई का अवसर दिए जाने के हकदार नहीं हैं।

जस्टिस जेबी पार्डीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने कलकत्ता हाई कोर्ट के उस फैसले को निरस्त कर दिया, जिसमें बैंक को खाते को फ्राड घोषित करने से पहले कर्जदार को व्यक्तिगत सुनवाई का अवसर देने का निर्देश दिया गया था।

शीर्ष अदालत ने रिजर्व बैंक के धोखाधड़ी जोखिम प्रबंधन से जुड़े नियमों की व्याख्या करते हुए कहा कि ‘प्राकृतिक न्याय’ के सिद्धांतों का पालन करने के लिए कारण बताओ नोटिस देना, जरूरी दस्तावेज उपलब्ध कराना, कर्जदार के जवाब पर विचार करना और कारण के साथ आदेश पारित करना पर्याप्त है। ये निष्पक्षता की शर्तों को पूरा करते हैं और न्याय में किसी तरह की चूक को रोकते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि बैंक किसी खाते को आडिट रिपोर्ट (फोरेंसिक ऑडिट समेत) के आधार पर फ्राड घोषित करते हैं, तो उसकी प्रति कर्जदार को देनी होगी ताकि वह अपनी आपत्ति या जवाब दे सके।

सुप्रीम कोर्ट में जीएचसीएए के अध्यक्ष की याचिका पर सुनवाई पूरी

सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को गुजरात हाई कोर्ट एडवोकेट्स एसोसिएशन (जीएचसीएए) के अध्यक्ष यतिन ओझा की याचिका पर सुनवाई पूरी हो गई।

याचिका में उन्होंने राज्य न्यायपालिका के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी करने के लिए हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती दी थी। हाई कोर्ट ने यतिन ओझा को दोषी ठहराते हुए अदालत के सत्र के समापन तक सजा सुनाई थी।

हाई कोर्ट ने ओझा पर 2,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया था और कहा था कि जुर्माना न भरने की स्थिति में उन्हें दो महीने की साधारण कारावास भुगतनी होगी।ओझा 20 दिसंबर, 2025 को 19वीं बार जीएचसीए अध्यक्ष चुने गए।

जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस ए.एस. चंदुरकर की पीठ ने ओझा की ओर से केके वेणुगोपाल, कपिल सिब्बल, अभिषेक मनु ¨सघवी और अर¨वद दातार सहित कई वरिष्ठ वकीलों की दलीलें सुनी।

गुजरात हाई कोर्ट की ओर से वरिष्ठ वकील विजय हंसारिया उपस्थित हुए, जिन्होंने कहा कि यह मुद्दा न्यायपालिका की अखंडता से संबंधित है।

सिब्बल ने पीठ से मामले को समाप्त करने का आग्रह करते हुए कहा कि ओझा ने अपनी टिप्पणियों के लिए कई बार बिना शर्त माफी मांगी है।

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