भोपाल में त्विषा शर्मा की मौत और उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा में दीपिका की मौत का मामला सिर्फ ताजा उदाहरण हैं।
कई मामलों में ससुराल में सताए जाने पर बेटियां जब घर आकर माता-पिता से शिकायत करती हैं तो उनकी बातों को गंभीरता से नहीं लिया जाता और समझौता करवा कर ससुराल वापस भेज दिया जाता है। लाडली बेटियां बलिवेदी पर चढ़ जाती हैं। तब रह जाता है पश्चाताप, यादें और आंसू।
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे ही एक मामले का जिक्र करते हुए समाज को सचेत किया है, जिसका निष्कर्ष यही निकलता है कि बेटी जब सताए जाने की शिकायत करे तो उस पर ध्यान दें।
उसे बार-बार समझौता करके वापस ससुराल न भेजें, ये खतरनाक हो सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने गत 25 मई को दहेज हत्या के मामले में दिए एक फैसले में समाज से ऐसे ही कुछ सवाल किए हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने दहेज हत्या पर गंभीर चिंता जताई
कोर्ट ने कहा कि क्या सोमा आचारजी (मृतक) की जान बचाई जा सकती थी? क्या सामाजिक बदनामी के डर से सोमा को भेड़ियों के आगे फेंक दिया गया? ये सवाल हमेशा काल्पनिक ही रहेंगे। दरअसल, शादी के कुछ ही दिनों बाद सोमा को दहेज की मांग के लिए जबरदस्त यातनाएं दी गईं।
उसने बार-बार अपने माता-पिता से उसे बचाने की गुहार लगाई। यहां तक कि वह मायके भी आई और कुछ दिनों तक उनके साथ रही, लेकिन जब भी उसने यह मुद्दा उठाया, तो बस यही कोशिश की गई कि किसी तरह समझौता करवा कर उसे वापस ससुराल भेज दिया जाए।
समझौते के नाम पर बलिवेदी पर न चढ़ाएं बेटियां
गांव के बड़े-बुर्जुगों को इसमें शामिल किया गया और एक दिखावटी समझौते के बाद प्रस्ताव भी पारित किए गए। उम्मीद यही कि जैसे-तैसे हालात बेहतर हो जाएंगे। इसी झूठी आस का अंत ससुराल में सोमा की दुखद मौत के साथ हुआ। कोर्ट ने कहा कि उम्मीद है कि उसकी जिंदगी की ये कहानी कई लोगों के लिए आंखें खोलने वाली साबित होगी।
समाज को सचेत करने वाला यह फैसला न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और केवी विश्वनाथन ने त्रिपुरा निवासी सोमा के पति गौर आचारजी की उम्रकैद की सजा पर मुहर लगाते हुए दिया। इस मामले में पोस्टमार्टम रिपोर्ट में सामने आई चोटें बताती हैं कि सोमा की हत्या की गई। उसके सिर पर हथौड़े से वार किया गया था, जिससे मौत हुई। हालांकि बड़ी चालाकी से हत्या को खुदकुशी साबित करने की कोशिश की गई और उसे मारने के बाद फांसी पर लटका दिया था।
दहेज उत्पीड़न और घरेलू हिंसा के कितने मामले
सुप्रीम कोर्ट ने मेडिकल साक्ष्य और गवाहों के बयान देखते हुए पति को दहेज हत्या में निचली अदालत और हाई कोर्ट से दी गई सजा को सही ठहराया। इससे पहले अप्रैल में भी सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसले में महिलाओं का दहेज उत्पीड़न और घरेलू हिंसा जारी रहने पर चिंता जताई थी। उसमें भी कोर्ट ने पत्नी को जलाकर मारने के दोषी की सजा बरकरार रखी थी।
कोर्ट ने कहा था कि दहेज प्रथा को लंबे समय से गैरकानूनी घोषित किया गया है और कानून में कई सुरक्षा उपाय मौजूद हैं, फिर भी ऐसी प्रथाओं को बनाए रखने वाली सामाजिक मान्यता को अभी तक समाप्त नहीं किया जा सका है।
वो फैसला जस्टिस संजय करोल और एन कोटीश्वर सिंह का था। उसमें कोर्ट ने एनसीआरबी के आंकड़े दिए हैं। जिससे पता चलता है कि 2023 में महिलाओं के खिलाफ 4.48 लाख से ज्यादा अपराध दर्ज हुए और दहेज से जुड़ी हिंसा हर साल 6000 से ज्यादा लोगों की जान ले रही है।
क्या कहते हैं आंकड़ें?
राष्ट्रीय महिला आयोग के आकड़ों से पता चला कि घरेलू उत्पीड़न सबसे ज्यादा रिपोर्ट की गई शिकायत थी। अभी त्विषा मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्वत: संज्ञान लिया है। शादी की अल्पावधि में हुई मौत पर कोर्ट ने चिंता जताई थी।
सुनवाई में सालिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा था कि एक बात तो स्पष्ट है कि उस लड़की ने अपनी जान गवां दी है। चाहे यह आत्महत्या हो या कुछ और। माता-पिता के लिए तलाकशुदा बेटी होना मृत बेटी से बेहतर है। उसके मैसेजों से पता चलता है कि वह नरक में जी रही थी।