ओडिशा की पुरी की तरह अपने कंपू के मंदिरों में भगवान जगन्नाथ बिराजे हैं। भीतरगांव के बेहटा बुजुर्ग गांव के जगन्नाथ मंदिर का निर्माण 11वीं या 12वीं सदी के आसपास का बताया जाता है। मंदिर में भगवान जगन्नाथ की मुख्य मूर्ति और शिल्पकला नागर शैली की है। यह मंदिर बौद्ध स्तूप सा लगता है। खास बात यह है यहां भगवान जगन्नाथ के साथ बलराम ही बिराजे हैं, बहन सुभद्रा नहीं हैं।
जनरलगंज में बिरजी भगत मंदिर, श्री जगन्नाथ मंदिर (बाई जी) मंदिर और उमा जगदीश मंदिर वर्षों पुराने हैं। श्री जगन्नाथ महाराज मंदिर बिरजी भगत की 216 वर्ष पुरानी रथ यात्रा 17 जुलाई को निकलेगी। प्रस्तुत है
बिरजी भगत मंदिर
जनरलगंज स्थित बिरजी भगत मंदिर की स्थापना संवत 1810 ईस्वी (वर्ष 1753) में हुई थी। स्व. बृजलाल ओमर ने अपने जीवन काल में श्रीराधाकृष्ण मंदिर बनवाने का संकल्प लिया था। उन्होंने काष्ठ की कारीगरी व नक्काशी युक्त मंदिर का भव्य निर्माण करवाया। एक मूर्तिकार ने अष्टधातु के जगन्नाथ, सुभद्रा, बलभद्र के विग्रहों का निर्माण किया था। उनका संपर्क बृजलाल ओमर से हुआ। उन्होंने यह अष्टधातु के श्री विग्रह मंदिर में संवत 11810 ईस्वी में स्थापित करवा दिए। वर्ष 1976-77 में स्व. राम कुमार ओमर (भगत जी) ने मंदिर का जीर्णोद्धार कराया था।
बाई जी मंदिर
श्री जगन्नाथ मंदिर (बाई जी) मंदिर 1845 में स्थापित हुआ था। कहा जाता है कि राजस्थान की बाई जी पुरी से भगवान जगन्नाथ की मूर्ति लेकर लौट रही थीं। उन्होंने शहर में विश्राम किया था। स्वप्न में एक भव्य मंदिर का दर्शन हुआ। इसमें उन्हें मिले विग्रह विराजमान थे। सुबह जब उन्होंने यात्रा आगे शुरू करनी चाही तो घोड़ा गाड़ी आगे न बढ़ सकी। भगवान की इच्छा जानकर उसी स्थान पर मंदिर का निर्माण कराकर श्री विग्रह स्थापित करवा दिए। यह स्थान एक नि:संतान सुनार दंपती का था। उन्होंने यह स्थान मंदिर के लिए दे दिया था। कुछ समय बाद बाई जी पनकी स्थित पंचमुखी श्री हनुमान मंदिर के महांत देवदास की शिष्या हो गईं। बाद में उन्होंने यह मंदिर महांत को समर्पित कर दिया था।
उमा जगदीश मंदिर
बिरजी भगत मंदिर से निकलने वाली यात्रा किन्ही कारणों से वर्ष 1954 में बंद हो गई थी। वर्ष 1955 में रथयात्रा कमेटी द्वितीय दिवस की स्थापना की गई क्योंकि बिरजी भगत मंदिर से निकलने वाली रथयात्रा की कोई संभावना नहीं थी। वर्ष 1956 में विग्रहों का निर्माण कराया गया। यह विग्रह वर्ष 1961 तक लाला बलदेव प्रसाद ओमर के पारिवारिक मंदिर में विराजमान रहे। स्व. वैजनाथ ओमर की पत्नी उमा देवी ने अपने निवास में श्री विग्रह स्थापित करने की इच्छा जताई। उमा देवी और उनकी सास राम प्यारी देवी ने अपनी चल-अचल संपत्ति भगवान को समर्पित कर दी। वर्ष 1965 में भवन मंदिर को दे दिया।
216 वर्ष से निकल रही जगन्नाथ यात्रा
श्री जगन्नाथ महाराज मंदिर बिरजी भगत की 216 वर्ष पुरानी रथ यात्रा 17 जुलाई को निकाली जाएगी। 11 जुलाई एकादशी को मंदिर के पट बंद होंगे और 14 जुलाई अमावस्या को शाम पांच बजे आरती के बाद पट खुलेंगे। 16 जुलाई को वार्षिक उत्सव पर सुबह पांच बजे भगवान के शृंगार के बाद दर्शन के लिए मंदिर खुला रहेगा। उसी दिन शाम सात बजे महाभिषेक व विशेष चंदन का शृंगार होगा।
बौद्ध स्तूप सा है बेहटा बुजुर्ग का जगन्नाथ मंदिर
भीतरगांव ब्लाक मुख्यालय से महज तीन किलोमीटर दूर बेहटा बुजुर्ग गांव स्थित जगन्नाथ मंदिर विशेष धार्मिक, ऐतिहासिक और भौगोलिक तथ्यों से परिपूर्ण है। मंदिर के गुंबद पर लगे पत्थर पर यहां भीषण गर्मी में बूंद आ जाती हैं। इन बूंदों का टपकना और बरसात आते ही सूख जाना किसी आश्चर्य से कम नहीं है। 15 दिन पहले ही मंदिर में पानी की बूंदों का टपकना मानसून आने का संकेत देता है। यह मंदिर बौद्ध स्तूप सा लगता है। ओडिशा शैली के जगन्नाथ मंदिरों से भिन्न है। ओडिशा शैली के मंदिरों में भगवान जगन्नाथ के साथ उनके अग्रज बलदाऊ और बहन सुभद्रा की मूर्तियां होती हैं। यहां काले पत्थर से बनी भगवान जगन्नाथ की मूर्ति के साथ केवल उनके अग्रज बलराम की ही छोटी मूर्ति है। उसके पीछे पत्थरों पर भगवान के दशावतार उकेरे गए हैं। इन दशावतारों में महात्मा बुद्ध के स्थान पर बलराम का चित्र उकेरा गया है। इस मंदिर में भगवान जगन्नाथ की मुख्य मूर्ति और शिल्पकला नागर शैली की है। ऐसे में इसका निर्माण 11वीं या 12वीं सदी के आसपास का बताया जाता है।
बीमार चल रहे भगवान जगन्नाथ
भगवान जगन्नाथ 29 जून को बीमार होने के कारण सुभद्रा और बलभद्र के साथ 15 दिन एकांतवास में चल रहे हैं। वह भक्तों द्वारा किए गए अत्यधिक जलाभिषेक के कारण अस्वस्थ हो गए थे। उन्हें औषधियुक्त काढ़े का भोग लगाया जा रहा है। 16 जुलाई को सुबह आरती के बाद वह भक्तों को दर्शन देंगे। इसके बाद शाम को जगन्नाथ यात्रा निकाली जाएगी।