चीन की चालबाजी कोई नई बात नहीं है। चाहे प्रशांत महासागर के क्षेत्र में अपने वर्चस्व की स्थापना की नाकाम कोशिश हो या फिर हथियारों के मामले में अपने ताकत का प्रदर्शन, ड्रैगन हमेशा से अपने नापाक इरादे समय-समय पर दुनिया को दिखाता रहता है। ऐसे में एक बार फिर चीन ने अपनी ऐसी ही हरकत से दुनिया को चौंका दिया है।
इस पूरे मामले को ऐसे समझिए कि प्रशांत महासागर में चीन की तरफ से परमाणु पनडुब्बी से दागी गई एक लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल ने पूरी दुनिया में हलचल मचा दी है। इस परीक्षण के बाद अमेरिका और उसके सहयोगी देशों में हड़कंप सा मच गया है, जिसको लेकर अमेरिका समेत कई देशों ने इसपर कड़ी और तीखी प्रतिक्रिया भी दी है।
बैखलाया अमेरिका, पड़ोसी देश भी परेशान
चीन के इस कदम के बाद एक तरफ जहां अमेरिका ने ड्रैगन पर परमाणु हथियारों का जखीरा तेजी से बड़ाने का आरोप लगाया है। वहीं दूसरी ओर चीन के पड़ोसी देशों ने इसे क्षेत्र के लिए बड़ा खतरा बताया है। अब सवाल ये है कि आखिर चीन से इस कदम से अमेरिका और उसके सहयोगी देशों की चिंता सातवें आसमान पर क्यों पहुंच गई? आइए हम आपको बताते हैं।
क्या है यह मिसाइल टेस्ट और क्यों है खास?
विशेषज्ञों के मुताबिक, यह पहली बार है जब चीन ने अपनी किसी परमाणु पनडुब्बी से प्रशांत महासागर में लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल (JL-2) दागने की बात सार्वजनिक रूप से कबूल की है। इस मिसाइल में नकली हथियार लगाया गया था। चीन ने इसे एक सामान्य और सालाना सैन्य अभ्यास का हिस्सा बताया है और कहा कि यह किसी देश को निशाना बनाकर नहीं किया गया।
अमेरिका तक मार करने की ताकत
ये दावा हम नहीं रक्षा क्षेत्र के विशेषज्ञों का कहना है। विशेषज्ञों ने इस परीक्षण के बात इस बात पर जोर दिया कि इस सफल परीक्षण से चीन ने यह साबित कर दिया है कि उसकी नौसेना अब अपने समुद्री इलाके के पास से ही सीधे अमेरिका की मुख्य भूमि को निशाना बना सकती है। अब चीन की परमाणु ताकत सिर्फ जमीन से दागी जाने वाली मिसाइलों तक सीमित नहीं रही।
अमेरिका और उसके सहयोगियों की क्या है प्रतिक्रिया?
हालांकि इस बात में भी कोई दोहराई नहीं कि इस परीक्षण के बाद एक साथ कई देशों ने चीन को आड़े हाथों लिया है। सबसे पहले बात अमेरिका की करें तो अमेरिकी विदेश विभाग के प्रवक्ता टॉमी पिगॉट ने कहा कि एक तरफ जहां अमेरिका परमाणु हथियारों को रोकने की कोशिश कर रहा है, वहीं चीन इसके उलट काम कर रहा है। उन्होंने चीन से परमाणु हथियारों के इस गुप्त विस्तार को रोकने और बातचीत करने की अपील की।
फिलीपींस और ताइवान भी चिंता का माहौल
फिलीपींस ने इसे सैन्य ताकत का ‘लापरवाह प्रदर्शन’ और उकसाने वाली कार्रवाई बताया। वहीं, ताइवान के राष्ट्रीय सुरक्षा सचिव जोसेफ वू ने कहा कि मिसाइल फिलीपींस के ऊपर से गुजरी। उन्होंने एक्स एक्स पर लिखा कि चीन एक बार फिर खुद को इलाके का बॉस साबित करने में लगा हुआ है।
इसके अलावा ऑस्ट्रेलिया और जापान ने इसे क्षेत्र को अस्थिर करने वाला कदम बताया और गंभीर चिंता व्यक्त की। न्यूजीलैंड ने नाराजगी जताई कि उन्हें टेस्ट से कुछ घंटे पहले ही इसकी जानकारी दी गई। वहीं, सोलोमन द्वीप के प्रधानमंत्री मैथ्यू वेल ने चीनी राजनयिकों के सामने इस टेस्ट का कड़ा विरोध दर्ज कराया।
ड्रैगन के बचाव में रूस
अब इस बात को समझना कितना आसान और कितना मुश्किल हो सकता है कि जहां एक तरफ क्षेत्रिए शांति और हथिरायों का जखीरा बढ़ाने का हवाला देते हुए दुनिया चीन का विरोध कर रही है। वहीं दूसरी ओर रूस ने चीन का साथ दिया है। क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेसकोव ने कहा कि मिसाइल टेस्ट करना चीन का ‘संप्रभु अधिकार’ है और चीन इससे किसी को धमकी नहीं दे रहा है।
अब समझिए दुनिया की असली चिंता क्या?
इस बात को ऐसे समझिए कि अमेरिकी रक्षा मंत्रालय के अनुमान के मुताबिक, चीन के पास इस समय करीब 600 परमाणु हथियार हैं, और जिस रफ्तार से वह आगे बढ़ रहा है, 2030 तक उसके पास 1000 से ज्यादा परमाणु हथियार होंगे।
वहीं प्रशांत महासागर में अपना दबदबा बनाए रखने के लिए अमेरिका और चीन के बीच पहले से ही तनातनी चल रही है। चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए ऑस्ट्रेलिया ने हाल ही में फिजी, वनुआतु और सोलोमन द्वीप जैसे देशों के साथ सुरक्षा समझौते किए हैं। ऐसे माहौल में चीन का यह मिसाइल परीक्षण इस बात का साफ संकेत है कि आने वाले दिनों में महाशक्तियों के बीच यह मुकाबला और ज्यादा कड़ा होने वाला है।