सर्वोच्च न्यायालय की नौ-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने ‘उद्योग’ शब्द की व्यापक व्याख्या करने वाले 1978 के फैसले की वैधता पर सुनवाई पूरी कर ली है और अपना निर्णय सुरक्षित रख लिया है।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ इस पर विचार कर रही है कि क्या ‘बेंगलुरु वाटर सप्लाई’ मामले में दिया गया फैसला सही था, जिसने औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के तहत करोड़ों श्रमिकों को सुरक्षा प्रदान की थी।
इस बीच, केंद्र सरकार ने गुरुवार को सर्वोच्च न्यायालय को बताया कि वह ”निश्चित रूप से श्रमिक विरोधी नहीं है” और श्रमिकों के हितों की रक्षा के लिए हर संभव प्रयास करेगी।
सरकार का पक्ष: संतुलन और वैश्विक अर्थव्यवस्था सुनवाई के दौरान अटार्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने स्पष्ट किया कि केंद्र सरकार ‘मजदूर विरोधी’ नहीं है और श्रमिकों के हितों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है।
उन्होंने कहा, ”हम एक वैश्वीकृत अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रहे हैं और हमें प्रबंधन के तरीकों पर निर्णय लेना होगा।” हालांकि, उन्होंने चेतावनी दी कि यदि वन जैसे सरकारी विभागों को ‘उद्योग’ माना गया, तो इससे सरकारी गतिविधियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।
दूसरी ओर, वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जय¨सह और सीयू सिंह जैसे वकीलों ने 1978 के फैसले का बचाव किया। उन्होंने तर्क दिया कि राज्यों को श्रमिक सुरक्षा कम करने के लिए अदालत पर बोझ नहीं डालना चाहिए।
‘ट्रिपल टेस्ट’ की वैधता पर सवाल अदालत मुख्य रूप से 1978 के फैसले में न्यायमूर्ति वीआर कृष्णा अय्यर द्वारा प्रतिपादित ‘ट्रिपल टेस्ट’ की समीक्षा कर रही है।
इस टेस्ट के अनुसार, यदि कोई व्यवस्थित गतिविधि नियोक्ता और कर्मचारी के सहयोग से वस्तुओं या सेवाओं के उत्पादन/वितरण के लिए की जाती है, तो वह ‘उद्योग’ है। इसमें अस्पताल, शैक्षणिक संस्थान और धर्मार्थ संगठन भी शामिल हो गए थे।
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एमिकस क्यूरी जे. कामा ने तर्क दिया कि सामाजिक कल्याण की भावना वैधानिक भाषा से ऊपर नहीं हो सकती। उन्होंने धर्मार्थ गतिविधियों को उद्योग की श्रेणी में रखने पर आपत्ति जताई।
मानवीय दृष्टिकोण और मुआवजा सुनवाई के दौरान पीठ ने केवल कानूनी पहलुओं पर ही नहीं, बल्कि मानवीय पक्ष पर भी ध्यान दिया।
कोर्ट ने अनुच्छेद 142 के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए पंजाब सिंचाई विभाग के एक मृतक कर्मचारी के कानूनी वारिसों को 10 लाख रुपये का एकमुश्त मुआवजा देने का आदेश दिया।
अब देश की नजर इस फैसले पर है, क्योंकि इसका असर न केवल मौजूदा विवादों पर पड़ेगा, बल्कि यह भी तय होगा कि भविष्य में किन क्षेत्रों के श्रमिकों को कानूनी सुरक्षा मिलेगी।