पूर्व जनरल अनिल चौहान का बड़ा बयान- ‘भारत-चीन के रिश्तों पर टिका है एशिया का भविष्य’…

 पूर्व चीफ आफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) जनरल अनिल चौहान ने कहा है कि भारत और चीन एशिया की दो बड़ी ताकतें, बड़ी अर्थव्यवस्थाएं और सभ्यतागत देश हैं। एशिया का भविष्य काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगा कि दोनों देश अपने एक साथ हो रहे उदय को कैसे संभालते हैं।

भारत रत्न पंडित गोविंद बल्लभ पंत की 139वीं जयंती पर आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए जनरल चौहान ने शनिवार को भारत-चीन संबंधों में मौजूद अवसरों और चुनौतियों पर संक्षेप में बात की।

उन्होंने कहा, चीन के साथ हमारे संबंधों को सिर्फ सीमा विवादों तक सीमित नहीं रखा जा सकता। चीन और भारत एशिया की दो बड़ी ताकतें, बड़ी अर्थव्यवस्थाएं और सभ्यतागत देश हैं। यह बात महत्वपूर्ण है। वे कुछ मामलों में सहयोग करते हैं, प्रभाव व बाजारों के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं, और क्षेत्रीय व वैश्विक व्यवस्था के पहलुओं पर अलग-अलग विचार रखते हैं।

जनरल चौहान ने कहा, इसलिए इस मुद्दे पर चीन के साथ बातचीत करने की जरूरत है। हम एससीओ और अब ब्रिक्स के हिस्से के तौर पर ऐसा कर रहे हैं। मेरा मानना है कि एशिया का भविष्य काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगा कि भारत और चीन अपने एक साथ उदय को कैसे संभालते हैं।

जनरल चौहान ने कहा कि सीमा-पार आतंकवाद के कारण पाकिस्तान भारत के लिए सुरक्षा की एक बड़ी चिंता बना रहेगा।

उन्होंने कहा, भारत के लिए बाहरी खतरों का माहौल सभी सीमाओं पर मौजूद कई कारकों से प्रभावित होता है। हमारे सामने सीमा-पार आतंकवाद की एक सक्रिय और परमाणु शक्ति संपन्न चुनौती है। मुझे लगता है कि पाकिस्तान सुरक्षा के लिए एक बड़ी चिंता बना रहेगा। मौजूदा परमाणु हथियारों ने उच्चतम स्तर पर एक तरह की ‘स्थिर स्थिरता’ की धारणा पैदा की है और इसी वजह से निचले स्तर पर अस्थिरता पैदा हुई है। इसे पारंपरिक रूप से स्टेबिलिटी पैराडाक्स (स्थिरता का विरोधाभास) कहा जाता है।

उन्होंने आगे कहा, पारंपरिक सैन्य अभियानों के लिए गुंजाइश कम करना और उप-पारंपरिक अभियानों के लिए गुंजाइश बढ़ाना, पाकिस्तान की रणनीति रही है।

उभरती चुनौतियों पर जनरल चौहान ने कहा कि भू-राजनीतिक अनिश्चितता वैश्विक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी चिंताओं में से एक है। उन्होंने कहा, मुझे लगता है कि हमारे सामने सबसे पहली और बड़ी चुनौती भू-राजनीतिक अनिश्चितता को कम करना है, जिससे वैश्विक सुरक्षा मिलती है।

पुराने संतुलन कमजोर पड़ गए हैं और नई व्यवस्था का ढांचा उभर रहा है। हमें हर तरह की आत्मनिर्भरता, कमजोरी को कम करने, विविधतापूर्ण स्वतंत्रता और निर्भरता घटाने के लिए तैयार रहना चाहिए।

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