अचानक आने वाली बाढ़ का पूर्वानुमान चुनौतीपूर्ण, सुनामी जैसी त्वरित तैयारी की जरूरत…

नेपाल में ग्लेशियर टूटने के बाद बुधवार को आई अचानक बाढ़ ने हिमालयी क्षेत्र में आपदा की निगरानी और उससे निपटने की तैयारियों पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि ग्लेशियर टूटने से आने वाली बाढ़ का सटीक पूर्वानुमान बेहद मुश्किल है। ऐसे में जापान की सुनामी तैयारी की तर्ज पर पहले से चेतावनी और निकासी की व्यवस्था विकसित करनी होगी।

विशेषज्ञों के मुताबिक हिमालय का क्षेत्र बहुत विशाल है और यहां हर ग्लेशियर पर निगरानी तंत्र लगाना आसान नहीं है। दूसरी चुनौती यह है कि ग्लेशियर टूटने के बाद पानी बेहद तेजी से नीचे की ओर आता है।

ऐसे में निगरानी तंत्र अलर्ट जारी भी कर दे तो लोगों को सुरक्षित स्थान तक पहुंचाने के लिए पर्याप्त समय मिलना मुश्किल हो सकता है। इसलिए खतरे वाले ग्लेशियरों और ग्लेशियल झीलों की उपग्रहों तथा रिमोट सेंसिंग तकनीक के जरिए लगातार निगरानी जरूरी है।

अलास्का विश्वविद्यालय में पर्यावरण विज्ञान के प्रोफेसर ईरन हुड ने बताया कि विज्ञानी जलस्तर में बदलाव पर नजर रखने के लिए रियल-टाइम वीडियो मानिटरिंग और लेजर मापन जैसी तकनीकों का इस्तेमाल करते हैं।

विशेषज्ञ समय-समय पर प्रभावित क्षेत्रों का दौरा कर यह भी आकलन करते हैं कि वहां बाढ़ का खतरा कब बढ़ सकता है। हालांकि, बुधवार की घटना में ग्लेशियर अचानक टूटने के कारण पहले से चेतावनी देना संभव नहीं था।

हुड के अनुसार भूकंपीय गतिविधियों की निगरानी और रिमोट सेंसिंग तकनीक के जरिए क्षेत्र की 3डी तस्वीर तैयार करना भविष्य में मददगार हो सकता है। इससे विज्ञानी समय के साथ ग्लेशियरों और आसपास के इलाके में हो रहे बदलावों को समझ सकेंगे और किसी हिस्से के टूटने या ढहने के खतरे का बेहतर आकलन कर पाएंगे।

एक अंतर-सरकारी निकाय की 2020 की रिपोर्ट के मुताबिक नेपाल में 2070 ग्लेशियल झीलें हैं। इनमें 21 को उच्च जोखिम वाली श्रेणी में रखा गया था। भारत और चीन के हिमालयी क्षेत्रों में भी बड़ी संख्या में ऐसी ग्लेशियल झीलें मौजूद हैं।

कोलोराडो विश्वविद्यालय के ग्लेशियर विशेषज्ञ एल्टन बायर्स ने कहा कि ऐसी आपदाओं से निपटने के लिए केवल चेतावनी प्रणाली पर्याप्त नहीं होगी। बाढ़ की आशंका वाले क्षेत्रों में निर्माण को नियंत्रित करना, सुरक्षित निकासी मार्ग विकसित करना और उन्हें स्पष्ट रूप से चिह्नित करना भी जरूरी है।

बायर्स ने जापान की सुनामी चेतावनी व्यवस्था का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां अलग-अलग भाषाओं में लगे संकेतक और प्रसारण लोगों को बताते हैं कि खतरे की स्थिति में उन्हें क्या करना है। आपदा के समय ऐसी जानकारी लोगों की जान बचाने में अहम भूमिका निभाती है।

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