प्रवीण नांगिया (ज्योतिष सलाहकार):
हर महीने में प्रदोष व्रत रखा जाता है। भगवान शंकर को प्रदोष का व्रत समर्पित है। मान्यताओं के अनुसार, प्रदोष का व्रत रखने से संतान सुख की कामना पूरी होती है।
इस दिन भोलेनाथ की उपासना करने से जातक के दुख दूर हो सकते हैं। हर महीने में 2 बार प्रदोष का व्रत रखा जाता है। आइए जानते हैं अक्टूबर में किस दिन रखा जाएगा प्रदोष व्रत, मुहूर्त व भगवान शिव की पूजा विधि-
कब है प्रदोष व्रत?
आश्विन महीने की शुक्ल त्रयोदशी तिथि 15 अक्टूबर को प्रारम्भ हो रही है, जो 16 अक्टूबर की रात तक रहेगी। ऐसे में अक्टूबर का पहला कृष्ण प्रदोष व्रत 15 अक्टूबर को रखा जाएगा।
वहीं, आश्विन महीने की कृष्ण त्रयोदशी तिथि 29 अक्टूबर को प्रारम्भ हो रही है, जो 30 अक्टूबर की दोपहर तक रहेगी। ऐसे में अक्टूबर का दूसरा शुक्ल प्रदोष व्रत 30 अक्टूबर को रखा जाएगा।
अक्टूबर प्रदोष व्रत शुभ मुहूर्त
शुक्ल त्रयोदशी तिथि प्रारम्भ – अक्टूबर 15, 2024 को रात 03:42 बजे
शुक्ल त्रयोदशी तिथि समाप्त – अक्टूबर 16, 2024 को 00:19 बजे
दिन का प्रदोष समय – 17:51 से 20:21
प्रदोष पूजा मुहूर्त – 17:51 से 20:21
अवधि – 02 घण्टे 30 मिनट्स
कृष्ण त्रयोदशी तिथि प्रारम्भ – अक्टूबर 29, 2024 को 10:31 बजे
कृष्ण त्रयोदशी तिथि समाप्त – अक्टूबर 30, 2024 को 13:15 बजे
दिन का प्रदोष समय – 17:38 से 20:13
प्रदोष पूजा मुहूर्त – 17:38 से 20:13
अवधि – 02 घण्टे 35 मिनट्स
पूजा-विधि
स्नान करने के बाद साफ वस्त्र धारण कर लें। शिव परिवार सहित सभी देवी-देवताओं की विधिवत पूजा करें। अगर व्रत रखना है तो हाथ में पवित्र जल, फूल और अक्षत लेकर व्रत रखने का संकल्प लें।
फिर संध्या के समय घर के मंदिर में गोधूलि बेला में दीपक जलाएं। फिर शिव मंदिर या घर में भगवान शिव का अभिषेक करें और शिव परिवार की विधिवत पूजा-अर्चना करें। अब प्रदोष व्रत की कथा सुनें। फिर घी के दीपक से पूरी श्रद्धा के साथ भगवान शिव की आरती करें। अंत में ॐ नमः शिवाय का मंत्र-जाप करें। अंत में क्षमा प्रार्थना भी करें।
शिव जी की आरती
जय शिव ओंकारा ॐ जय शिव ओंकारा।
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव अर्द्धांगी धारा॥ ॐ जय शिव…॥
एकानन चतुरानन पंचानन राजे।
हंसानन गरुड़ासन वृषवाहन साजे॥ ॐ जय शिव…॥
दो भुज चार चतुर्भुज दस भुज अति सोहे।
त्रिगुण रूप निरखता त्रिभुवन जन मोहे॥ ॐ जय शिव…॥
अक्षमाला बनमाला मुण्डमाला धारी।
चंदन मृगमद सोहै भाले शशिधारी॥ ॐ जय शिव…॥
श्वेताम्बर पीताम्बर बाघम्बर अंगे।
सनकादिक गरुणादिक भूतादिक संगे॥ ॐ जय शिव…॥
कर के मध्य कमंडलु चक्र त्रिशूल धर्ता।
जगकर्ता जगभर्ता जगसंहारकर्ता॥ ॐ जय शिव…॥
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका।
प्रणवाक्षर के मध्ये ये तीनों एका॥ ॐ जय शिव…॥
काशी में विश्वनाथ विराजत नन्दी ब्रह्मचारी।
नित उठि भोग लगावत महिमा अति भारी॥ ॐ जय शिव…॥
त्रिगुण शिवजी की आरती जो कोई नर गावे।
कहत शिवानंद स्वामी मनवांछित फल पावे॥ ॐ जय शिव…॥
जय शिव ओंकारा हर ॐ शिव ओंकारा|
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव अर्धांगी धारा॥ ॐ जय शिव ओंकारा…॥
डिस्क्लेमर: इस आलेख में दी गई जानकारियों पर हम यह दावा नहीं करते कि ये पूर्णतया सत्य एवं सटीक हैं। विस्तृत और अधिक जानकारी के लिए संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें।