ऑपरेशन सनडाउन: इंदिरा गांधी ने आखिरी समय में क्यों रोका था मिशन? सफल होता तो शायद नहीं होती ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’ की नौबत…

साल 1984…पंजाब का माहौल बेहद तनावपूर्ण था। अमृतसर के हरमंदिर साहिब परिसर में हथियारबंद लोगों की मौजूदगी की खबरें लगातार आ रही थीं। केंद्र सरकार चिंतित थी, खुफिया एजेंसियां अलर्ट पर थीं और पूरे देश में एक नाम सबसे ज्यादा चर्चा में था…. जरनैल सिंह भिंडरांवाले

बहुत कम लोग जानते हैं कि ऑपरेशन ब्लू स्टार से पहले सरकार ने एक और बेहद गुप्त मिशन की तैयारी की थी। 

फ्लैशबैक में आज कहानी ऑपरेशन सनडाउन की… एक ऐसा सीक्रेट ऑपरेशन, जिसे शुरू होने से ठीक पहले तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने रद कर दिया था। कहा जाता है कि अगर उस वक्त इस मिशन को मंजूरी मिल जाती, तो शायद भारत का इतिहास कुछ और होता।

1947 में पंजाब के मोगा जिले के रोडे गांव में हुआ था। वह दमदमी टकसाल नाम के सिख धार्मिक संगठन से जुड़ा था और शुरुआत में उसकी पहचान एक धार्मिक प्रचारक के तौर पर बनी। लेकिन धीरे-धीरे उसकी भाषा आक्रामक और विवादित होती गई। 1970 के दशक के आखिर तक वह सिर्फ धार्मिक चेहरा नहीं रहा, बल्कि पंजाब की राजनीति और कट्टरपंथी आंदोलन का बड़ा नाम बन गया।

उस समय पंजाब में चंडीगढ़ पर अधिकार, नदी के पानी का बंटवारा, आनंदपुर साहिब प्रस्ताव और सिखों के अधिकार जैसे मुद्दों को लेकर तनाव बढ़ रहा था। अकाली दल इन मांगों को राजनीतिक तरीके से उठा रहा था, लेकिन इसी दौर में कट्टरता और हिंसा भी बढ़ने लगी। 

पंजाब केसरी के मालिक जगत नारायण की हत्या

1981 में पत्रकार और पंजाब केसरी समूह के मालिक लाला जगत नारायण की हत्या के बाद पंजाब में हालात तेजी से बिगड़ गए। सरकार और सुरक्षा एजेंसियों का मानना था कि भिंडरांवाले के समर्थकों का नाम कई हिंसक घटनाओं में सामने आ रहा था। इसी वजह से उसकी छवि एक उग्रवादी नेता के तौर पर मजबूत होने लगी।

1982 और 1983 तक हालात और गंभीर हो गए। भिंडरांवाले अमृतसर के अकाल तख्त में रहने लगा, जहां उसके साथ हथियारबंद समर्थक भी मौजूद थे। सरकारी एजेंसियों की रिपोर्ट में दावा किया गया कि परिसर के अंदर हथियार जमा किए जा रहे हैं और मजबूत मोर्चेबंदी बनाई जा रही है।

पुलिसकर्मियों, नेताओं और आम लोगों पर हमलों की घटनाएं बढ़ने लगी थीं। केंद्र सरकार को डर था कि पंजाब में अलगाववाद और हिंसा तेजी से फैल रही है। यही वजह थी कि मामला सिर्फ कानून-व्यवस्था तक सीमित नहीं रहा बल्कि देश की आंतरिक सुरक्षा और धार्मिक संवेदनशीलता का बड़ा संकट बन गया।

ऑपरेशन सनडाउन क्या था?

इसी दौरान सरकार और खुफिया एजेंसियों ने मिलकर एक सीक्रेट मिशन तैयार किया, जिसे ‘ऑपरेशन सनडाउन’ नाम दिया गया। यह योजना रिसर्च एंड एनालिसिस विंग और विशेष कमांडो यूनिट की मदद से बनाई गई थी।

प्लान का मकसद था कि रात के समय गुप्त तरीके से कमांडो कार्रवाई कर भिंडरांवाले को जिंदा पकड़ लिया जाए। कोशिश यह थी कि हरमंदिर साहिब परिसर को नुकसान न पहुंचे और श्रद्धालुओं की जान भी सुरक्षित रहे। 

जीबीएस सिद्धू (रिसर्च एंड एनालिसिस विंग/RAW के पूर्व विशेष सचिव) अपनी किताब ‘खालिस्तान षडयंत्र’ के चैप्टर 9 में लिखते हैं-
हेलीबॉर्न कमांडो हेलीकॉप्टर के जरिए स्वर्ण मंदिर परिसर में उतरने वाले थे और बेहद कम समय में ऑपरेशन खत्म करने की तैयारी थी।

  • ऑपरेशन सनडाउन का मकसद सिर्फ भिंडरांवाले को पकड़ना नहीं था, बल्कि ऐसा करना था जिससे स्वर्ण मंदिर परिसर को कम-से-कम नुकसान पहुंचे और मामला बड़े सैन्य टकराव में न बदल जाए। इसलिए RAW, स्पेशल फ्रंटियर फोर्स (SFF), सीआरपीएफ और दूसरी एजेंसियों के बीच बेहद बारीकी से प्लान तैयार किया गया।

जीबीएस सिद्धू की अगर आप किताब पढ़ेंगे तो इसमें पेज नंबर 144 में जो लिखा है शायद ही आपको मालूम हो। आइए एक-एक कर पूरा प्लान समझते हैं।

  • सीआरपीएफ जवान पूरे स्वर्ण मंदिर परिसर को चारों तरफ से घेरने वाले थे। इसका उद्देश्य यह था कि ऑपरेशन शुरू होने के बाद कोई भी व्यक्ति अंदर या बाहर न जा सके।
  • सुरक्षा एजेंसियों को डर था कि अगर बाहर से हथियारबंद समर्थक पहुंच गए या भीतर मौजूद लोग भागने लगे, तो हालात नियंत्रण से बाहर हो सकते हैं। इसलिए सबसे पहले पूरे इलाके को सील करने की तैयारी की गई थी।
  • इसके बाद असली कार्रवाई शुरू होनी थी। Mi4 हेलीकॉप्टर बहुत कम ऊंचाई पर उड़ते हुए परिसर के ऊपर पहुंचते। इनमें मौजूद SFF कमांडो अचानक नीचे उतरते और सीधे उस जगह की तरफ बढ़ते, जहां भिंडरांवाले प्रवचन देता था।
  • एजेंसियों ने यह समय इसलिए चुना था क्योंकि माना जा रहा था कि प्रवचन खत्म होने के दौरान उसके आसपास सुरक्षा घेरा अपेक्षाकृत कमजोर होगा और कमांडो तेजी से कार्रवाई कर पाएंगे।
  • ऑपरेशन में कमांडोज की अलग-अलग जिम्मेदारियां तय की गई थीं। कुछ कमांडो सीधे भिंडरांवाले को पकड़ने के लिए आगे बढ़ते, जबकि दूसरी टीम उसके हथियारबंद गार्ड्स को रोकती। इसके साथ ही SFF और सीआरपीएफ की बाकी टीमें दो हिस्सों में बंटने वाली थीं।
  • एक टीम पूरे स्वर्ण मंदिर परिसर के भीतर निगरानी रखती, ताकि अगर भिंडरांवाले भागने की कोशिश करे तो उसका रास्ता तुरंत रोका जा सके। 
  • दूसरी टीम बुलेटप्रूफ गाड़ियों में लंगर परिसर और गुरु नानक निवास के बीच वाले रास्ते पर तैनात रहती। योजना यह थी कि हेलीकॉप्टर से उतरे कमांडो भिंडरांवाले को पकड़कर इसी रास्ते तक लाएंगे और फिर वहां मौजूद सुरक्षा बल उसे अपने कब्जे में लेकर तय स्थान पर ले जाएंगे।
  • RAW और SFF ने इस मिशन की तैयारी के लिए दिल्ली में स्वर्ण मंदिर परिसर का मॉडल भी तैयार कराया था। इसी मॉडल पर कमांडोज को लगातार अभ्यास कराया गया। 

रिपोर्ट्स के मुताबिक ब्रिटेन की स्पेशल एयर सर्विस यानी SAS के सलाहकारों ने भी हेलीकॉप्टर मूवमेंट, कमांडो लैंडिंग और ऑपरेशन के तालमेल को लेकर सुझाव दिए थे। उनका मानना था कि अगर ऑपरेशन कुछ ही मिनटों में पूरा हो जाए तो गोलीबारी और आम लोगों के हताहत होने का खतरा कम किया जा सकता है।

ऑपरेशन सनडाउन का पूरा प्लान तैयार होने के बाद सबसे अहम और आखिरी फेज़ था। इसे प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सामने रखना। उस समय RAW के पूर्व प्रमुख और इंदिरा गांधी के सबसे भरोसेमंद सुरक्षा सलाहकारों में गिने जाने वाले आर.एन. काओ इस मिशन की निगरानी कर रहे थे। वहीं, इस पूरे ऑपरेशन की ग्राउंड प्लानिंग और कमांडो स्ट्रैटेजी तैयार करने में SFF से जुड़े अधिकारी नागरानी की अहम भूमिका थी।

इंदिरा गांधी की वो बैठक, आखिर क्या हुआ था?

बैठक इंदिरा गांधी के 1, सफदरजंग रोड स्थित आवास के पास बने उनके निजी दफ्तर में हुई। शुरुआत में नागरानी थोड़ा हिचकिचा रहे थे। उनका मानना था कि ऑपरेशन की पूरी जानकारी काओ के पास भी है, इसलिए वही प्रधानमंत्री को ब्रीफ कर दें। लेकिन आखिर में नागरानी को ही पूरी योजना समझानी पड़ी और उस दौरान आर.एन. काओ भी वहीं मौजूद थे।

 नागरानी ने इंदिरा गांधी को बताया कि कैसे Mi4 हेलीकॉप्टर्स की मदद से SFF कमांडो स्वर्ण मंदिर परिसर में उतरेंगे, कैसे सीआरपीएफ बाहर से पूरे इलाके की घेराबंदी करेगी और कैसे कुछ ही मिनटों में भिंडरांवाले को पकड़कर बाहर निकालने की कोशिश की जाएगी।

उन्होंने यह भी बताया कि ऑपरेशन का सबसे बड़ा मकसद धार्मिक स्थल को नुकसान से बचाना और बड़े सैन्य संघर्ष से बचना है, लेकिन पूरी ब्रीफिंग के दौरान इंदिरा गांधी का ध्यान सिर्फ इस बात पर नहीं था कि ऑपरेशन कितना सफल हो सकता है। उनका सबसे बड़ा सवाल था ‘इसमें कितने लोगों की जानमाल को नुकसान पहुंच सकता है?’ यही वह सवाल था, जिसने पूरी योजना की दिशा बदल दी।

नागरानी ने जवाब दिया कि ऑपरेशन में दोनों हेलीकॉप्टर खोने का खतरा हो सकता है और करीब 20 प्रतिशत कमांडो मारे जा सकते हैं। लेकिन जब इंदिरा गांधी ने पूछा कि आम नागरिकों की कितनी मौत हो सकती है, तब नागरानी के पास कोई साफ जवाब नहीं था। 

सबसे बड़ी परेशानी यह थी कि ऑपरेशन बैसाखी के आसपास करने की योजना थी। उस समय स्वर्ण मंदिर परिसर में हजारों श्रद्धालु मौजूद रहते थे। किसी को ठीक-ठीक अंदाजा नहीं था कि ऑपरेशन के दौरान वहां कितने लोग होंगे और गोलीबारी या भगदड़ की स्थिति में कितनी जानें जा सकती हैं।

इंदिरा गांधी ने क्यों रोका ऑपरेशन सनडाउन?

काफी देर चर्चा के बाद नागरानी ने अनुमान जताया कि अगर ऑपरेशन के रास्ते में बड़ी संख्या में श्रद्धालु आ गए, तो करीब 20 प्रतिशत आम नागरिकों की मौत हो सकती है। यही आंकड़ा सुनकर इंदिरा गांधी असहज हो गईं।

उन्हें लगा कि अगर सिखों के सबसे पवित्र धार्मिक स्थल में बड़ी संख्या में आम लोगों की मौत होती है, तो उसका असर सिर्फ पंजाब तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे देश में भारी तनाव फैल सकता है।

यहीं पर ऑपरेशन सनडाउन रुक गया… लेकिन पंजाब में हिंसा और तनाव लगातार बढ़ता रहा। कुछ महीनों बाद हालात इतने बिगड़ गए कि वही सरकार, जो सीमित कमांडो ऑपरेशन से समाधान चाहती थी, आखिरकार सेना की बड़ी कार्रवाई यानी ऑपरेशन ब्लू स्टार की तरफ बढ़ गई।

ऑपरेशन ब्लू स्टार के तहत 6 दिन क्या हुआ?

उस समय तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल ए. एस. वैद्य थे, जबकि ऑपरेशन का नेतृत्व मैदान में लेफ्टिनेंट जनरल कुलदीप सिंह बराड़ ने संभाला।

  • 1 जून 1984 से अमृतसर में सेना की गतिविधियां बढ़ने लगीं। शहर में कर्फ्यू लगाया गया और संचार व्यवस्था पर नियंत्रण शुरू हो गया।
  • 3 जून 1984 को गुरु अर्जन देव शहीदी गुरुपर्व था, इसलिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु हरमंदिर साहिब पहुंचे हुए थे। यही वजह बाद में सबसे ज्यादा विवाद का विषय बनी, क्योंकि ऑपरेशन के समय परिसर में आम श्रद्धालु भी मौजूद थे।
  • 5 जून 1984 की रात सेना ने हरमंदिर साहिब परिसर में प्रवेश शुरू किया। शुरुआती योजना सीमित बल प्रयोग की थी, लेकिन सेना को भारी प्रतिरोध का सामना करना पड़ा। अकाल तख्त में बैठे उग्रवादी लगातार गोलीबारी कर रहे थे। इसके बाद सेना ने बख्तरबंद गाड़ियां और भारी हथियारों का इस्तेमाल किया। पूरी रात गोलीबारी चलती रही।
  • 6 जून 1984 तक सेना ने परिसर पर नियंत्रण हासिल कर लिया। इसी दौरान जरनैल सिंह भिंडरांवाले मारा गया। उसके साथ पूर्व मेजर जनरल शबेग सिंह और कई समर्थक भी मारे गए।

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