हिंदू धर्म में सावन के महीने का अधिक महत्व है। इस माह में भगवान शिव की पूजा-अर्चना करने का अधिक महत्त्व है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, सावन में जलाभिषेक करने से महादेव की कृपा प्राप्त होती है। सावन में होनी वाली कांवड़ यात्रा का विशेष महत्व है।
कांवड़ यात्रा को भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने के लिए अधिक फलदायी माना जाता है। इस यात्रा की शुरुआत को लेकर कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं, जिनमें एक कथा भगवान परशुराम से जुड़ी है। क्या आप जानते हैं कि भगवान परशुराम ने सावन में कांवड़ क्यों उठाई थी? अगर नहीं पता, तो ऐसे में आइए आपको बताते हैं क्या है कांवड़ यात्रा का इतिहास।
भगवन परशुराम ने की थी कांवड़ यात्रा की शुरुआत
भगवान परशुराम को भगवान विष्णु का छठा अवतार माना जाता है। भगवान परशुराम भगवान के भक्त थे। पौराणिक कथा के अनुसार, पहला कांवड़िया भगवान परशुराम को माना जाता है। भगवान परशुराम ने महादेव को प्रसन्न करने के लिए त्रेतायुग के दौरान सावन के महीने में गढ़मुक्तेश्वर से पवित्र गंगाजल लाए थे और उत्तर प्रदेश के पुरा महादेव मंदिर में महादेव का जलाभिषेक किया था, जिससे कांवड़ यात्रा की शुरुआत हुई। आज के समय में भी इस जगह का कांवड़ यात्रा से विशेष संबंध माना जाता है।
सावन में क्यों होती है कांवड़ यात्रा?
सावन का पवित्र महीना भगवान शिव को अधिक प्रिय है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, जब समुद्र मंथन से निकला हलाहल विष भगवान शिव ने ग्रहण किया था, तो विष के तेज से शिव जी का कंठ नीला पड़ गया। इसलिए भगवान शिव को नीलकंठ कहा जाता है। तब भगवान परशुराम ने विष की भयंकर गर्मी और जलन को शांत करने के लिए शिव जी पर गंगाजल से उनका अभिषेक किया था।
कब चढ़ेगा कांवड़ यात्रा का जल?
वैदिक पंचांग के अनुसार, कांवड़ यात्रा का जल सावन शिवरात्रि के दिन चढ़ाया जाता है। इस खास अवसर पर भगवान शिव का विशेष जलाभिषेक किया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, शिव जी का जलाभिषेक करने से महादेव की कृपा प्राप्त होती है। इस बार 11 अगस्त को सावन शिवरात्रि मनाई जाएगी। इसी दिन कांवड़ यात्रा का जल चढ़ाया जाएगा।