भारत-पाक दोस्ती की अनूठी कहानी, भारतीय मित्र के नाम समर्पित हुआ क्लासरूम…

भारत-पाकिस्तान विभाजन के लगभग आठ दशक बाद, लाहौर का ऐतिहासिक 140 साल पुराना ‘एचीसन कॉलेज’ दोनों देशों के बीच पुरानी यादों का एक अनोखा पुल बन गया है। कॉलेज के ‘क्लासरूम नंबर 108’ को पंजाब (भारत) के पूर्व मुख्यमंत्री और बंटवारे से पहले यहां के छात्र रहे हरचरण सिंह बराड़ की याद में समर्पित किया गया है।

इस क्लासरूम में अंग्रेजी, उर्दू और गुरमुखी (इक ओंकार) में ‘ईश्वर एक है’ लिखी एक पट्टिका लगाई गई है, जिसका अनावरण बराड़ की बेटी बबली बराड़ ने किया। सबसे खास बात यह है कि इस सम्मान का पूरा खर्च बराड़ के स्कूल के दिनों के दोस्त और पाकिस्तान के 100 वर्षीय प्रमुख उद्योगपति सैयद बाबर अली ने उठाया है, जिन्होंने दोनों देशों के बीच दुश्मनी और युद्धों के बावजूद अपनी दशकों पुरानी दोस्ती को जिंदा रखा।

2009 में बराड़ की मृत्यु तक कायम रही दोस्ती

100 वर्षीय सैयद बाबर अली एचीसन कॉलेज के सबसे उम्रदराज जीवित पूर्व छात्र हैं। वे एक जाने-माने उद्योगपति, पूर्व वित्त मंत्री और कॉलेज के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स के सबसे लंबे समय तक सदस्य रहे हैं। उनकी दोस्ती अविभाजित पंजाब में शुरू हुई थी और बंटवारे, युद्धों और दशकों की दुश्मनी के बावजूद 2009 में बराड़ की मृत्यु तक कायम रही।

1886 में स्थापित और पाकिस्तान के ‘ईटन’ के रूप में मशहूर एचीसन कॉलेज ने कई पीढ़ियों के नेताओं को शिक्षा दी है, जिनमें पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान, जफरउल्लाह खान जमाली और फिरोज खान नून शामिल हैं।

1989 में लाहौर की आखिरी यात्रा

बराड़ 1937 में एचिंसन में शामिल हुए और एक छात्र, प्रीफेक्ट और खिलाड़ी के तौर पर बेहतरीन प्रदर्शन किया। 1989 में लाहौर की अपनी आखिरी यात्रा के दौरान, उन्हों नेएचीसन कॉलेज में एक लाइब्रेरी का उद्घाटन किया और उसे अली को समर्पित किया। तीन दशक से भी ज्यादा समय बाद अली ने भी वैसा ही किया है।

बराड़ की पट्टिका एक बड़े यादगार प्रोजेक्ट का हिस्सा है, जिसके तहत अली ने 1934-43 के अपने सहपाठियों और शिक्षकों के सम्मान में क्लासरूम और पट्टिकाओं के लिए फंड दिया है। इनमें पंडित हेतवा नंद कश्यप, राम रखा मल, सरदार हरबख्श सिंह, सरदार हरनाम सिंह बाल, लाला धनी राम, लाला शांति लाल सहगल और पटियाला के महाराजा भूपिंदर सिंह के बेटे शामिल हैं।

यह सभी मिलकर उस अविभाजित पंजाब की याद दिलाते हैं, जब इतिहास ने इसके लोगों को सीमाओं के आर-पार बिखेर दिया था। लाहौर के एचीसन कॉलेज में पूर्व छात्रों को समर्पित क्लासरूम, बंटवारे से पहले के दौर को याद करने की एक बड़ी मुहिम का हिस्सा हैं।

‘लाहौर हेरिटेज एरिया रिवाइवल प्रोजेक्ट’ के तहत कई इलाकों के पुराने नाम (इस्लामपुरा से कृष्ण नगर, रहमान गली से राम गली और सुन्नत नगर से संत नगर जैसे पुराने नाम फिर से बहाल किए गए हैं) बहाल किए गए हैं और भगत सिंह के स्मारक बनाने पर भी चर्चा जारी है।

1947 में कॉलेज के 245 छात्रों में से लगभग 160 हिंदू और सिख थे, जो छुट्टियों में भारत गए और हालात बिगड़ने पर कभी लौट नहीं सके। कॉलेज प्रशासन अब भारत-पाकिस्तान के बीच एक पुल बनकर उनकी दोस्ती और बिछड़ने की अनकही कहानियों को सहेज रहा है।

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