एक कोशिश ऐसी भी…

वर्षा वर्मा (समाज सेविका):

जैसा कि आप सभी से मेरा वादा रहा है कि हर पोस्ट के माध्यम से जन्म और मृत्यु से जुड़ी परंपराओं एवं संस्कारों की छोटी-छोटी जानकारियां साझा करता रहूंगा। इसी क्रम में आज हम मृत्यु संस्कार से जुड़ी एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया “कपाल क्रिया” के बारे में चर्चा कर रहे हैं।

हिंदू अंतिम संस्कार परंपरा में कपाल क्रिया का विशेष महत्व माना जाता है। जब शव अग्नि को समर्पित किया जाता है, तब एक निश्चित समय पर लकड़ी या डंडे की सहायता से कपाल (सिर के ऊपरी भाग) को स्पर्श या हल्का आघात दिया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मानव शरीर का सबसे कठोर हिस्सा सिर होता है, इसलिए यह प्रक्रिया इस उद्देश्य से की जाती है कि शरीर पूर्ण रूप से पंचतत्व में विलीन हो सके।

लोकमान्यताओं में यह भी कहा जाता है कि कपाल क्रिया आत्मा को सांसारिक मोह-माया और पुरानी स्मृतियों से मुक्त करने का प्रतीकात्मक माध्यम है, जिससे अगले जन्म में पूर्व जन्म की स्मृतियों का प्रभाव न रहे। कुछ लोग इसे परिवारजनों के मोह से आत्मा की अंतिम विदाई के रूप में भी देखते हैं।

इसी भावना के साथ संस्था द्वारा 4 लावारिस शवों के अंतिम संस्कार के उपरांत उनके मोक्ष प्राप्ति हेतु बिठूर घाट पर विधि-विधान से पूजा-अर्चना संपन्न कराई गई। पंडित जी के मार्गदर्शन में सभी धार्मिक अनुष्ठान पूरे श्रद्धा भाव से किए गए।

बाकी सब प्रभु की इच्छा है।

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