वर्षा वर्मा (समाज सेविका – लखनऊ):
कफन आज भले ही छोटा हो, लेकिन उस मासूम की मौत के पीछे छिपा दुख का पहाड़ उतना ही बड़ा है।
यह केवल एक नवजात शिशु की मौत नहीं, बल्कि हमारी संवेदनाओं, सामाजिक जिम्मेदारियों और इंसानियत की भी मौत है। अब समय आ गया है कि हम खुद से एक सवाल पूछें—आखिर हमारा समाज किस दिशा में जा रहा है?
लगातार ऐसी खबरें सामने आ रही हैं, जिनमें नवजात शिशुओं के शव झाड़ियों, नालियों, नालों, सड़क किनारे या सुनसान स्थानों पर पड़े मिलते हैं। ये दृश्य केवल दिल दहला देने वाले नहीं हैं, बल्कि हमारी सामूहिक विफलता का आईना भी हैं। जिस समाज में एक मासूम को जन्म लेते ही जीने का अधिकार न मिले, वहां विकास और आधुनिकता के दावों पर गंभीर सवाल खड़े होना स्वाभाविक है।
तकनीक बढ़ी, शिक्षा का स्तर बढ़ा, सुविधाएं बढ़ीं, लेकिन क्या हमारी संवेदनाएं भी उतनी ही बढ़ीं? दुर्भाग्य से कई बार इसका उत्तर ‘नहीं’ में मिलता है। आधुनिकता का वास्तविक अर्थ सोच का विकास, मानवीय मूल्यों का सम्मान और जिम्मेदारी का निर्वहन है, न कि रिश्तों और जीवन के प्रति संवेदनहीन होना।
ऐसी घटनाओं के पीछे कई सामाजिक कारण हो सकते हैं—गरीबी, सामाजिक कलंक, अविवाहित मातृत्व का डर, पारिवारिक दबाव, या जागरूकता की कमी। लेकिन कोई भी कारण एक नवजात को इस तरह मरने के लिए छोड़ देने का नैतिक औचित्य नहीं बन सकता। यदि किसी कारणवश बच्चे का पालन-पोषण संभव नहीं है, तो आज कानूनी और सामाजिक स्तर पर कई ऐसे विकल्प उपलब्ध हैं, जिनके माध्यम से उस मासूम को सुरक्षित जीवन दिया जा सकता है।
यह केवल सरकार या प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं है। समाज, परिवार, शिक्षण संस्थान, सामाजिक संगठन और हम सभी को मिलकर ऐसी सोच विकसित करनी होगी, जहां हर नवजात का स्वागत हो, न कि उसे जन्म लेते ही मौत के हवाले कर दिया जाए।
हमें यह समझना होगा कि सभ्यता की पहचान ऊंची इमारतों, महंगी गाड़ियों या आधुनिक तकनीक से नहीं होती, बल्कि इस बात से होती है कि वह अपने सबसे कमजोर और असहाय लोगों के साथ कैसा व्यवहार करती है।
आइए, हम संकल्प लें कि ऐसी किसी भी घटना को केवल खबर बनकर नहीं रहने देंगे। जागरूकता फैलाएंगे, जरूरतमंदों की मदद करेंगे और ऐसी परिस्थितियां बनने ही नहीं देंगे, जहां किसी मासूम को जीवन से पहले मौत मिल जाए।
यदि आधुनिकता हमें संवेदनहीन बना रही है, तो ऐसी आधुनिकता पर पुनर्विचार करना ही होगा। क्योंकि विकास वही है, जिसमें इंसानियत सबसे आगे हो।