पश्चिम बंगाल में गुरुवार को पहले चरण की वोटिंग पूरी हो गई।
इस दौरान कई लोग इस बात से दुखी रहें कि, उन्हें लोकतंत्र के पर्व में हिस्सा लेने का मौका नहीं मिला। वहीं, टाइम्स ऑफ इंडिया (TOI) ने इसको लेकर एक रिपोर्ट बनाई है। इसमें मालदा के कई गांव में लोगों से बातचीत की गई।
मोथाबाड़ी गांव में उनसे पूछा गया “क्या आप लोग हमारा नाम दर्ज करने आए हैं? क्या हम वोट डाल पाएंगे?” मतदान के दिन मोथाबाड़ी में सैकड़ों ऐसे वोटर थे, जिनके नाम लिस्ट से काट दिए गए थे।
इसी महीने के पहले हफ्ते में, यह छोटा-सा गांव तब सुर्खियों में आया था, जब नाराज वोटरों ने कुछ न्यायिक मजिस्ट्रेटों को घंटों तक बंधक बनाकर रखा था।
मोथाबाड़ी में कई लोग नहीं डाल पाए वोट
तब से लेकर अब तक, मोथाबाड़ी में कई घटनाएं घटी हैं। NIA की जांच, कई गिरफ्तारियां, CAPF की तैनाती और लगातार चलता रहा राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का खेल।
लेकिन चुनाव के दिन, बाकी सभी मुद्दे पीछे छूट गए। हर किसी की जबान पर बस एक ही शब्द था, ‘SIR’। उन लोगों के लिए भी जो वोट डाल पाए, और उससे भी ज्यादा उन लोगों के लिए जो वोट नहीं डाल पाए।
अलीनगर के मतिउर रहमान ने अपना एडमिट कार्ड से लेकर माध्यमिक (10वीं) और पोस्ट-ग्रेजुएशन तक के सभी दस्तावेज जमा किए थे, लेकिन उन्हें यह जानकर गहरा झटका लगा कि, उनका नाम और उनके परिवार के दो अन्य सदस्यों के नाम भी वोटर लिस्ट से काट दिए गए थे।
उन्होंने पूछा, “जिन लोगों की किस्मत अच्छी थी, वे तो वोट डालने बूथ पर चले गए, लेकिन आज हमें तो सड़क पर कदम रखने की भी इजाजत नहीं है। क्या इसी को लोकतंत्र कहते हैं?”
2024 में दिया था वोट, इस बार अमान्य क्यों ?
मोथाबाड़ी के सरदारपारा इलाके में महिलाओं का एक समूह, जिनमें मंजू बीवी, असीमा खातून और चांदनी खातून शामिल थी। मीडिया वालों को देखते ही अपने-अपने EPIC कार्ड (वोटर पहचान पत्र) हाथों में थामे हुए अपनी झोपड़ियों से बाहर निकल आईं।
उन्होंने कहा, “हमने कई बार वोट डाला है। यहां तक कि 2024 के आम चुनावों में भी हमने इन्हीं कार्डों का इस्तेमाल करके वोट दिया था। अब वे अमान्य क्यों हैं?”
उन्होंने कहा कि, महीनों तक वे सुनवाई के लिए कतारों में खड़े रहे और दस्तावेज जमा किए। देश के लोकतंत्र के सबसे बड़े उत्सव को दूर से देखते हुए, उनकी बस एक ही गुजारिश थी, “कृपया हमारे नाम दर्ज कर लें और यह सुनिश्चित करें कि अगली बार हम वोट दे सकें।”
महालदारटोला के साठ वर्षीय दिलीप एसके अभी भी यह समझने की कोशिश कर रहे थे कि उन्हें सूची से बाहर क्यों कर दिया गया।
उनके बेटे आजाद का नाम मतदाता सूची में था, लेकिन उनका नहीं। “अगर मेरा नाम नहीं है, तो मेरे बेटे का नाम कैसे है?” उन्होंने पूछा। दिलीप ने दावा किया कि 2002 की मतदाता सूची में उनका नाम मौजूद था, जिसके आधार पर बाद में उनके बेटों के नाम दर्ज किए गए थे, फिर भी उनका नाम हटा दिया गया।