‘तेजस Mk-1A’ की एंट्री से बढ़ेगी IAF की ताकत, जल्द होगा बेड़े में शामिल…

 भारतीय वायुसेना के बेड़े को मजबूत करने वाले स्वदेशी लड़ाकू विमान ‘तेजस मार्क 1ए’ की आपूर्ति को लेकर एक बड़ी और सकारात्मक खबर आई है।

रक्षा उत्पादन सचिव संजीव कुमार ने पूर्ण विश्वास जताया है कि वर्तमान वित्तीय वर्ष में हिंदुस्तान एयरोनाटिक्स लिमिटेड (एचएएल) द्वारा इन विमानों की डिलीवरी सुनिश्चित की जाएगी।

हालांकि, इस परियोजना में कुछ कारणों से देरी हुई है, लेकिन अब उम्मीद की नई किरण दिखाई दे रही है।

कुमार ने बताया कि तेजस विमान लगभग 90 प्रतिशत तैयार है, लेकिन कुछ हथियारों के एकीकरण (इंटीग्रेशन) का अंतिम काम अभी बाकी है।

उन्होंने साफ किया कि विमान की डिलीवरी में देरी की मुख्य वजह अमेरिकी कंपनी जीई एयरोस्पेस से इंजनों की आपूर्ति में रुकावट है।

कोविड-19 महामारी और वैश्विक स्तर पर नागरिक उड्डयन क्षेत्र में बढ़ी इंजनों की मांग के कारण जीई की सप्लाई चेन प्रभावित हुई। साथ ही, पश्चिम एशिया संकट के चलते साफ्टवेयर मिलने में भी देरी हुई है।

भारतीय वायुसेना ने स्पष्ट किया है कि वह पूरी तरह संचालित और अपडेटेड कान्फिगरेशन में ही विमान स्वीकार करेगी। तेजस की बढ़ती लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कई देशों ने इसे खरीदने में गहरी दिलचस्पी दिखाई है।

रक्षा उत्पादन सचिव के अनुसार, तेजस के लिए दुनिया भर के कई देश इच्छुक दिख रहे हैं, लेकिन भारत ने एक रणनीतिक फैसला लिया है।

हमारी पहली प्राथमिकता भारतीय वायुसेना की जरूरतों को पूरा करना है, उसके बाद ही रक्षा निर्यात शुरू किया जाएगा। वर्तमान में वायुसेना ने दो किश्तों में 180 तेजस मार्क 1ए विमानों का आर्डर दिया है, जो भारत की हवाई संप्रभुता को नई ताकत देंगे।

ड्रोन निर्माण एवं रक्षा क्षेत्र में निजी भागीदारी व आत्मनिर्भरता पर जोर

संजीव कुमार के अनुसार, भारत में एक मजबूत ड्रोन विनिर्माण इकोसिस्टम बनाने के लिए निजी क्षेत्र अधिक सक्षम और कुशल है। सरकार की नीतियों का मुख्य फोकस रक्षा उत्पादन में निजी क्षेत्र की भागीदारी को बढ़ाना है, जो रक्षा विभाग, रक्षा उत्पादन विभाग और डीआरडीओ की पहलों में भी झलकता है।

उन्होंने ‘दोहरे उपयोग वाली तकनीक’ पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता बताई, ताकि युद्ध के समय नागरिक फैक्टि्रयां तेजी से रक्षा उत्पादन में बदलाव कर सकें। रक्षा क्षेत्र में ‘आत्मनिर्भरता’ को परिभाषित करते हुए उन्होंने कहा कि इसका अर्थ देश की सीमाओं के भीतर ही नहीं, बल्कि आपूर्ति श्रृंखला पर भारत का नियंत्रण होना है।

वास्तविक आत्मनिर्भरता का लक्ष्य डिजाइन क्षमताओं को भारत के पास रखना और सशस्त्र बलों की जरूरतों के अनुसार हथियारों में बदलाव करना है।

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