कुर्दिस्तान के राष्ट्रपति को अमेरिका ने बनाया था मोहरा? ईरान की जासूसी के लिए कैसे रचा गया कथित षड्यंत्र…

मई के मध्य में जब संयुक्त राज्य अमेरिका ने ईरान के साथ सीधी बातचीत शुरू की, तो उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती तेहरान के वास्तविक रुख को समझना था।

इस स्थिति को स्पष्ट करने के लिए डोनल्ड ट्रंप प्रशासन ने इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स के साथ एक गुप्त माध्यम स्थापित किया।

इसका मुख्य उद्देश्य पुष्टि करना था कि क्या ईरानी वार्ताकार संसद अध्यक्ष मोहम्मद बागेर गालिबफ और विदेश मंत्री अब्बास अराघची वास्तव में ईरानी सेना के शीर्ष नेतृत्व की सहमति से बातचीत कर रहे हैं।

इस गुप्त माध्यम के लिए इराक के कुर्दिस्तान क्षेत्र के राष्ट्रपति नेचिरवान बारजानी को चुना गया, जिन पर अमेरिका और IRGC दोनों गहरा भरोसा करते हैं।

नेचिरवान बारजानी को ही क्यों गया चुना?

कुर्दिस्तान क्षेत्रीय सरकार उत्तरी इराक के एक अर्ध-स्वायत्त क्षेत्र का प्रशासन संभालती है, जिसका मुख्यालय इरबिल में है। नेचिरवान बारजानी का ईरान के साथ बहुत पुराना और गहरा संबंध रहा है। ईरान-इराक युद्ध के दौरान बारजानी ने ईरान में शरण ली थी और वहीं तेहरान विश्वविद्यालय से अपनी पढ़ाई पूरी की थी।

अमेरिकी मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, वह धाराप्रवाह फारसी बोलते हैं और ईरानी शासन के कई वरिष्ठ नेताओं के साथ-साथ IRGC के शीर्ष अधिकारियों के साथ उनके बेहद करीबी व्यक्तिगत संबंध हैं।

पूरे मध्य पूर्व क्षेत्र में उनकी छवि एक व्यावहारिक और सर्वमान्य समस्या समाधानकर्ता के रूप में है, जिसके कारण अमेरिका ने इस नाजुक काम के लिए उन पर भरोसा जताया।

अमेरिका ने बारजानी से कैसे साधा संपर्क?

इस गुप्त मिशन की शुरुआत 10 मई के आसपास हुई, जब तत्कालीन राष्ट्रीय खुफिया निदेशक तुलसी गबार्ड ने सबसे पहले बारजानी से संपर्क किया। गबार्ड ने इराकी नेता को बताया कि ट्रंप प्रशासन को IRGC कमांडर जनरल अहमद वाहिदी से संपर्क साधने के लिए उनकी मदद की सख्त आवश्यकता है।

सूत्रों के मुताबिक, गबार्ड ने बारजानी को स्पष्ट कर दिया था कि वह यह कॉल राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उपराष्ट्रपति जेडी वेंस की सीधी मंजूरी के बाद कर रही हैं।

गबार्ड ने उन्हें बताया कि चूंकि अमेरिका सीधे तौर पर वाहिदी तक नहीं पहुंच सकता, इसलिए वे यह स्पष्टता चाहते हैं कि क्या IRGC नेतृत्व गालिबफ और अराघची की बातचीत का समर्थन कर रहा है या फिर उनकी कुछ अलग मांगें और योजनाएं हैं।

एन्क्रिप्टेड फोन से IRGC कमांडर से बातचीत

अमेरिकी अनुरोध को स्वीकार करते हुए, बारजानी ने तुरंत टीम ट्रंप का संदेश IRGC में अपने संपर्कों तक पहुंचाया। उन्होंने ईरानी अधिकारियों से सीधे वाहिदी से बात करने की इच्छा जताई, जिस पर तेहरान ने अपनी सहमति दे दी।

इसके बाद 14 मई को एक IRGC अधिकारी ने इरबिल स्थित बारजानी के कार्यालय में उनसे व्यक्तिगत रूप से मुलाकात की और पूरी तरह सुरक्षित बातचीत के लिए उन्हें एक एन्क्रिप्टेड फोन सौंपा।

इसी फोन का इस्तेमाल करते हुए बारजानी ने वाहिदी से संपर्क किया और उनसे पूछा कि क्या वह ईरानी वार्ताकारों के रुख के साथ खड़े हैं।

IRGC कमांडर ने सकारात्मक उत्तर देते हुए स्पष्ट किया कि वह वार्ताकारों का पूरा समर्थन करते हैं और यही IRGC का भी आधिकारिक रुख है, क्योंकि वे इस संकट को बातचीत के जरिए ही सुलझाना चाहते हैं। यह महत्वपूर्ण संदेश बारजानी ने तुरंत तुलसी गबार्ड को दिया, जिसे बाद में व्हाइट हाउस को सौंप दिया गया।

इरबिल में गुप्त बैठक का प्रस्ताव

ईरानी सेना के शीर्ष नेतृत्व से यह सकारात्मक पुष्टि मिलने के बाद, ट्रंप प्रशासन ने कूटनीतिक प्रयासों को आगे बढ़ाने का फैसला किया। अमेरिका ने बारजानी के जरिए एक और प्रस्ताव भेजा, जिसमें इरबिल में वरिष्ठ अमेरिकी और ईरानी वार्ताकारों के बीच एक गुप्त बैठक आयोजित करने की बात कही गई थी।

हालांकि, यह प्रस्तावित बैठक कभी हकीकत में नहीं बदल सकी क्योंकि ईरानी पक्ष ने अपनी सुरक्षा को लेकर गहरी चिंताएं व्यक्त कीं और वार्ता से पीछे हट गए।

घटनाक्रम क्यों है महत्वपूर्ण?

मई में वाशिंगटन द्वारा बारजानी से संपर्क करने का यह पूरा घटनाक्रम इस बात को रेखांकित करता है कि ट्रंप प्रशासन के लिए ईरान के साथ बातचीत करना कितना जटिल रहा है, खासकर तब जब यह स्पष्ट न हो कि तेहरान में सत्ता की असली बागडोर किसके हाथ में है।

हालांकि संयुक्त राज्य अमेरिका और ईरान मई में एक सहमति पत्र (MoU) तक पहुंचने में कामयाब रहे थे, लेकिन भाषा और शब्दों को लेकर हुई असहमति के कारण वह समझौता जल्द ही टूट गया।

वर्तमान में, पाकिस्तान और कतर दोनों देशों के बीच मध्यस्थ के रूप में संदेशों का आदान-प्रदान कर रहे हैं, लेकिन अब तक कोई खास सफलता हाथ नहीं लगी है।

कुछ सूत्रों का मानना है कि गतिरोध को तोड़ने और कूटनीतिक गति बनाए रखने के लिए इस्लामाबाद स्थिति को वास्तविकता से अधिक सकारात्मक रूप में पेश कर रहा है।

भविष्य की किसी भी बातचीत में वाशिंगटन के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही सुनिश्चित करना होगी कि वे सीधे उन लोगों से बात कर रहे हैं जो असल में फैसले लेते हैं, और इसके लिए उन्हें बारजानी जैसे विश्वसनीय मध्यस्थों की निरंतर आवश्यकता होगी।

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