“गोद लेने की प्रक्रिया पर अंतिम फैसला जिला मजिस्ट्रेट का अधिकार”, बॉम्बे हाई कोर्ट का अहम निर्णय…

बांबे हाई कोर्ट ने किशोर न्याय (देखभाल और संरक्षण) अधिनियम में संशोधन को उचित ठहराते हुए सोमवार को कहा कि जिला मजिस्ट्रेट को दत्तक ग्रहण या गोद लेने संबंधी कार्यवाही की सुनवाई और निर्णय लेने का अधिकार है।

हाई कोर्ट ने किशोर न्याय (देखभाल और संरक्षण) अधिनियम में किए गए संशोधन को चुनौती देने वाली दो दंपतियों द्वारा दायर याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा था, जिसके तहत गोद लेने का आदेश जारी करने की शक्ति न्यायालयों से जिला मजिस्ट्रेटों (कार्यकारी अधिकारियों) को हस्तांतरित कर दी गई थी।

संशोधन में न्यायालय शब्द को कलेक्टर और जिला मजिस्ट्रेट (कार्यकारी अधिकारी) शब्दों से बदला गया है।

जस्टिस भारती डांगरे और जस्टिस मंजुषा देशपांडे की पीठ ने कहा कि जिला मजिस्ट्रेट द्वारा कानून के प्रविधानों को लागू करने और भावी दत्तक माता-पिता की पात्रता निर्धारित करने में कोई कठिनाई नहीं दिखती है। हमें इसमें कोई संदेह नहीं है कि जिला मजिस्ट्रेट बच्चों के कल्याण में कार्य करने और सहायता करने के लिए पूरी तरह से उपयुक्त हैं और याचिकाकर्ताओं की धारणा गलत है।

यह संशोधन गोद लेने की प्रक्रिया को तेज करने के लिए किया गया था और इसमें कुछ भी अवैध नहीं है। किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम के तहत गोद लेने की प्रक्रिया के लिए वैध आदेश की आवश्यकता होती है।

याचिकाकर्ताओं ने दावा किया था कि गोद लेने की मंजूरी देना न्यायिक कार्य है जिसे किसी कार्यकारी प्राधिकरण, जैसे कि जिला मजिस्ट्रेट को नहीं सौंपा जा सकता है, जिसके पास आवश्यक विशेषज्ञता न हो। हाई कोर्ट ने कहा, जिला मजिस्ट्रेट द्वारा दत्तक ग्रहण प्रक्रिया से निपटने में सक्षम न होने के संबंध में याचिकाकर्ताओं द्वारा व्यक्त की गई आशंका निराधार है।

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