देश में डॉक्टरों को प्रैक्टिस करने की अनुमति देने के मामले में दो राज्यों ने दो बिल्कुल अलग-अलग मॉडल अपनाए हैं। जहां आंध्र प्रदेश ने अंतर-राज्यीय प्रैक्टिस को बेहद आसान बना दिया है, वहीं महाराष्ट्र ने वेरिफिकेशन सुरक्षा उपायों को बरकरार रखा है।
दोनों राज्यों के इन फैसलों ने देश में डॉक्टरों के लिए एक नेशनल रजिस्ट्रेशन फ्रेमवर्क बनाने की बहस को एक बार फिर हवा दे दी है।
रजिस्ट्रेशन पर कहीं भी प्रैक्टिस की छूट
आंध्र प्रदेश सरकार ने डॉक्टरों को बड़ी राहत देते हुए एक बड़ा फैसला लिया। सरकार ने घोषणा की कि देश के किसी भी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश की मेडिकल काउंसिल में रजिस्टर्ड डॉक्टर बिना किसी अलग रजिस्ट्रेशन या नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट के आंध्र प्रदेश में प्रैक्टिस कर सकते हैं।
राज्य के डियरेगुलेशन रिफॉर्म्स के तहत उठाए गए इस कदम का उद्देश्य उस पुरानी व्यवस्था को खत्म करना है, जिसके कारण एक से दूसरे राज्य में जाने वाले डॉक्टरों को लंबे समय तक इंतजार करना पड़ता था।
हालांकि, आंध्र प्रदेश मेडिकल काउंसिल के सदस्य डॉ. डग्गुमाटी श्रीहरि राव ने स्पष्ट किया कि इसका मतलब यह नहीं है कि डॉक्टरों पर कोई निगरानी नहीं रहेगी।
उन्होंने कहा कि दूसरे राज्यों के डॉक्टरों को ऑनलाइन आवेदन करना होगा, अपने रजिस्ट्रेशन की पूरी जानकारी देनी होगी और यह घोषणा करनी होगी कि उनके खिलाफ कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई तो नहीं चल रही है। काउंसिल संबंधित राज्य से इन विवरणों की पुष्टि करेगी।
एनओसी की शर्त खत्म, लेकिन वेरिफिकेशन जरूरी
आंध्र प्रदेश के इस फैसले से कुछ दिन पहले ही महाराष्ट्र मेडिकल काउंसिल ने एक अलग रुख अपनाया था। महाराष्ट्र ने डॉक्टरों के लिए खुद एनओसी लाने की जरूरत को तो खत्म कर दिया, लेकिन रजिस्ट्रेशन और वेरिफिकेशन की अनिवार्यता को बरकरार रखा है।
नए नियम के तहत, महाराष्ट्र काउंसिल अब डॉक्टरों के मूल राज्य की काउंसिल से खुद ही वेरिफिकेशन मांगेगी और क्लीयरेंस मिलने तक डॉक्टरों को प्रोविजनल रजिस्ट्रेशन जारी करेगी।
आर्म्ड फोर्सेस के डॉक्टरों से शुरू हुई थी बहस
देशभर में सिंगल रजिस्ट्रेशन की यह बहस तब तेज हुई, जब नेशनल मेडिकल कमीशन ने आर्म्ड फोर्सेस मेडिकल सर्विसेज के डॉक्टरों को लेकर एक प्रस्ताव पर विचार किया। चूंकि सेना के डॉक्टरों का लगातार ट्रांसफर होता रहता है, इसलिए उन्हें सिंगल रजिस्ट्रेशन के आधार पर देशभर में प्रैक्टिस करने की अनुमति देने का प्रस्ताव है।
आरटीआई एक्टिविस्ट डॉ. बाबू वी. का मानना है कि आंध्र प्रदेश का फैसला एक बड़ा सुधार साबित हो सकता है। उन्होंने कहा कि कागजी कार्रवाई और ब्यूरोक्रेसी के कारण डॉक्टरों को वहां सेवा देने से रोकना जहां उनकी जरूरत है, मरीजों या देश के हित में नहीं है। अगर सेना के डॉक्टरों के लिए देशव्यापी अधिकार पर विचार हो सकता है, तो इसे सभी डॉक्टरों के लिए लागू किया जाना चाहिए।
इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ. अनिल कुमार जे. नायक ने वेरिफिकेशन हटाने को लेकर सचेत किया है। उनका कहना है कि रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया को आसान जरूर बनाया जाना चाहिए, लेकिन जवाबदेही से समझौता नहीं किया जा सकता। किसी डॉक्टर पर दूसरे राज्य में कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई तो नहीं चल रही है, यह जानने के लिए वेरिफिकेशन बेहद जरूरी है।