अदालती फैसलों में होने वाली देरी पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने देश के सभी उच्च न्यायालयों को निर्देश दिया है कि आदेश सुरक्षित रखने के बाद अधिकतम 3 महीने के भीतर फैसला सुनाएं। चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जोयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि फैसलों में देरी से वादियों को अपूरणीय क्षति होती है।
सुप्रीम कोर्ट ने विशेष रूप से व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े मामलों में तेजी लाने को कहा है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच ने कहा कि जमानत की अर्जियों पर आदेश उसी दिन सुनाए जाने चाहिए, और अगर उन्हें सुरक्षित रखा जाता है, तो उन्हें अगले ही दिन सुनाया और अपलोड किया जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जमानत या सजा निलंबित करने का आदेश सुनाए जाने के तुरंत बाद जेल अधिकारियों को सूचित किया जाना चाहिए, और विचाराधीन कैदी/दोषी को बेहतर होगा कि उसी दिन, या ज्यादा से ज्यादा अगले दिन रिहा कर दिया जाए।
15 दिनों में वेबसाइट पर अपलोड होना चाहिए फैसला
संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर फैसले का सिर्फ मुख्य हिस्सा (ऑपरेटिव हिस्सा) सुनाया जाता है, तो फैसले का पूरा विवरण (तर्क सहित) 15 दिनों के भीतर वेबसाइट पर अपलोड कर दिया जाना चाहिए।
फैसले में देरी होने पर चीफ जस्टिस से संपर्क कर सकता है संबंधित पक्ष
सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि अगर फैसला सुरक्षित रखने के चार महीने के भीतर फैसला नहीं सुनाया जाता है, तो संबंधित पक्ष हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस से संपर्क कर सकते हैं, ताकि मामले को किसी दूसरी बेंच को सौंपा जा सके।
बेंच ने आगे कहा कि जब किसी फैसले का पूरा विवरण (तर्क सहित) खुली अदालत में सुनाया जाता है, तो उस फैसले को 24 घंटे के भीतर वेबसाइट पर अपलोड कर दिया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि उसके द्वारा जारी किए गए इन निर्देशों का मकसद किसी खास जज या हाई कोर्ट के किसी फैसले पर कोई सवाल उठाना नहीं है।