सुप्रीम कोर्ट ने 80 वर्षीय दोषी की सजा में संशोधन किया, कहा- अदालतें संवेदनहीन नहीं हो सकतीं…

सुप्रीम कोर्ट ने 1992 के एक आपराधिक मामले में दोषी ठहराए गए 80 वर्षीय व्यक्ति की सजा को संशोधित करते हुए कहा कि अदालतें संवेदनहीन नहीं होनी चाहिए। अदालत ने उसे जेल में बिताए गए समय के बराबर सजा दी।

जस्टिस के विनोद चंद्रन और एनवी अंजरिया की पीठ ने शुक्रवार को उस व्यक्ति की सजा को बरकरार रखा, जिसने इस मामले में कुल छह साल और तीन महीने की कैद काटी है। 

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने अपीलकर्ता को भारतीय दंड संहिता की धारा 304 भाग ढ्ढढ्ढ (हत्या के समान अपराध) के तहत दोषी ठहराते हुए सात साल की सजा सुनाई थी।

शीर्ष अदालत ने कहा,”अपीलकर्ता की उम्र वर्तमान में 80 वर्ष से अधिक है। चूंकि अपीलकर्ता एक वृद्ध व्यक्ति हैं और अपने जीवन के दिसंबर में हैं, इसलिए इस चरण में उन्हें फिर से जेल भेजना कठोर और अनुचित होगा। अदालतें संवेदनहीन नहीं होनी चाहिए।”

पीठ ने कहा कि उसकी उम्र, तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए उसकी सजा को पहले से काटी गई अवधि तक घटाया जाता है।

शीर्ष अदालत ने उस व्यक्ति द्वारा उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती देने वाली अपील पर अपना निर्णय सुनाया, जिसने उसकी सजा को भारतीय दंड संहिता की धारा 302 (हत्या) से धारा 304 भाग ढ्ढढ्ढ में बदल दिया था।

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