बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की टीएमसी में टूट के बाद अब उद्धव ठाकरे की शिवसेना पर भी खतरे के बादल मंडरा रहे हैं। खबर है कि शिवसेना (यूबीटी) के 9 में से 6 सांसद एकनाथ शिंदे वाली शिवसेना का समर्थन कर सकते हैं। इसको लेकर मुखपत्र सामना में एक लेख लिखा गया है, जिसमें दल-बदलुओं की आलोचना की गई है।
शिवसेना (UBT) ने बुधवार को कहा कि राजनीति पूरी तरह से अनिश्चित हो गई है और यह बताना नामुमकिन है कि कब किसकी किस्मत अचानक चमक जाए। पश्चिम बंगाल का उदाहरण देते हुए पार्टी ने कहा कि यह स्थिति अब बेहद बेतुकेपन के स्तर पर पहुंच गई है।
‘एक अनजान और कमजोर संगठन की लग गई लॉटरी’
सामना में लिखा गया, ‘नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया’ (NCPI) नाम के एक अनजान और कमजोर संगठन की मानो राजनीतिक लॉटरी लग गई है। उसे अचानक 22 बने-बनाए सांसद मिल गए हैं।
शिवसेना (UBT) ने अपने मुखपत्र ‘सामना’ के एक संपादकीय में कहा कि शिवसेना या शरद पवार की नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी (NCP) जैसी स्थापित क्षेत्रीय राजनीतिक ताकतें भी कभी एक बार में इतनी बड़ी संख्या में सांसद नहीं जुटा पाईं।
इसमें आगे कहा गया, कई राजनीतिक पार्टियां तो एक भी विधायक या सांसद चुनने के लिए संघर्ष करते हुए ही अपना पूरा अस्तित्व बिता देती हैं। जो काम प्रकाश अंबेडकर, रामदास अठावले और अरविंद केजरीवाल जैसे बड़े नेता नहीं कर पाए वह त्रिपुरा में रजिस्टर्ड एनसीपीआई ने रातों-रात कर दिखाया।
‘रणनीतिक चालों से हो पाया संभव’
संपादकीय के अनुसार, भारतीय लोकतंत्र का यह चमत्कार पूरी तरह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की रणनीतिक चालों की वजह से संभव हुआ।
संपादकीय में कहा गया, “हालांकि यह पार्टी त्रिपुरा से है। एक ऐसा राज्य जहां से लोकसभा में सिर्फ दो सदस्य जाते हैं लेकिन त्रिपुरा की यह पार्टी अब लोकसभा में 22 सीटों पर काबि होगी और पूरी तरह से पीएम मोदी के हां में हां मिलाने वाले के तौर पर काम करेगी। यह उस कहावत का सटीक उदाहरण है कि जब ऊपर वाला देता है तो छप्पर फाड़कर देता है यानी बिना मांगे उन पर बेशुमार दौलत बरसा दी। मजे की बात यह है कि एनसीपीआई के प्रमुख उत्तिया कुंडू को इस बात की भनक तक नहीं थी कि उनकी पार्टी की अचानक 20 से 22 बने-बनाए सांसदों की लॉटरी लग गई है।”
संपादकीय में कहा गया है कि उनकी पार्टी में सांसदों के अचानक शामिल होने (जिसे ‘मनी लॉन्ड्रिंग’ जैसा बताया गया) से वे पूरी तरह हैरान, घबराए हुए और उलझन में पड़ गए।
ठाकरे गुट ने दावा किया, “पार्टी बदलने वाले सांसदों को कुंडू से डरने की कोई वजह नहीं है। तृणमूल कांग्रेस के डरपोक, स्वार्थी और समझौतावादी सांसदों ने अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कुंडू की एक छोटी-मोटी पार्टी में बड़े पैमाने पर विलय की साजिश रची।”
‘भारतीय राजनीति के लिए काला अध्याय’
लेख में कहा गया, “यह भारतीय राजनीति के इतिहास में एक काला अध्याय है। कोलकाता में बीजेपी ने जो पक्का वादा किया था कि चुनाव के बाद तृणमूल कांग्रेस का नामोनिशान तक नहीं बचेगा, वह असल में सच हो गया है। इससे यह बात सामने आ गई है कि ममता बनर्जी की पार्टी भगोड़ों और समझौतावादी लोगों से भरी हुई थी, जिनकी बंगाली पहचान (‘मां, माटी, मानुष’) को लेकर की गई बड़ी-बड़ी बातें पूरी तरह खोखली थीं।”
इसमें आगे लिखा गया, “उन्हें ममता बनर्जी या बंगाल के गौरव से कोई सच्चा लगाव नहीं था। हार की आहट मिलते ही वे ताश के पत्तों की तरह ढह गए और सूखे पत्तों की तरह बिखर गए।”
ठाकरे गुट के अनुसार, यह राजनीतिक खेल सिर्फ बंगाल तक सीमित नहीं है और दिल्ली में सत्ताधारी पार्टी ने दूसरे स्वाभिमानी और आत्म-सम्मान वाले राज्यों में भी ठीक यही रणनीति अपनाई है। फिलहाल, राजनीतिक बाजार में पार्टी बदलने वालों और गद्दारों की ही सबसे ज्यादा कीमत है।