सरकारी कार्यक्रमों में पूरा ‘वंदे मातरम्’ गाने के फैसले पर शशि थरूर ने जताई आपत्ति, बोले- इसे बिना वजह थोपा जा रहा…

वंदे मातरम् के पूरे गाने के फैसले को लेकर चल रही बहस के बीच कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने मंगलवार को सवाल उठाया कि क्या हर सार्वजनिक कार्यक्रम में इस राष्ट्रगीत को पूरा गाया जाना जरूरी है।

इसे अनावश्यक और बोझिल बताते हुए थरूर ने कहा कि वंदे मातरम् के प्रति सम्मान को हर मौके पर इसे पूरा गाने को अनिवार्य बनाने के साथ नहीं जोड़ा जाना चाहिए। उनकी यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब आधिकारिक कार्यक्रमों में राष्ट्रगीत का पूरा संस्करण गाए जाने की मांगों को लेकर विवाद बढ़ता जा रहा है।

‘हर कोई करता है वंदे मातरम् का सम्मान’

पत्रकारों से बात करते हुए कांग्रेस के वरिष्ठ नेता ने कहा कि हालांकि हर कोई वंदे मातरम् का सम्मान करता है, लेकिन हर कार्यक्रम में इसे पूरा गाए जाने की शर्त को सही ठहराना मुश्किल है। उन्होंने कहा, “वंदे मातरम् हमारा राष्ट्रगीत है और जब इसे गाया जाता है तो हम सम्मान में खड़े हो जाते हैं। इसका पहला पद या शुरुआती कुछ पद ज्यादातर लोगों को जुबानी याद होते हैं।”

बिना वजह थोपा गया नियम है’

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता ने कहा कि लंबे समय से यह परंपरा रही है कि किसी कार्यक्रम की शुरुआत में एक बार ‘वंदे मातरम’ गाया जाता है, जबकि राष्ट्रगान अलग से। अक्सर कार्यक्रम के अंत में बजाया जाता है।

उन्होंने कहा, “अब वे चाहते हैं कि हर कार्यक्रम की शुरुआत में और फिर आखिर में सभी पांचों छंद गाए जाएं। मुझे लगता है कि यह एक अनावश्यक थोपा हुआ नियम है।”

‘मामले पर लेना होगा फैसला’

थरूर ने बताया कि जहां एक तरफ केरलम सरकार का कहना है कि पूरा गीत गाना वैकल्पिक है, वहीं दूसरी तरफ गवर्नर राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर की राय कुछ अलग ही लगती है।

उन्होंने कहा, “आखिरकार इस मामले पर कोई फैसला लेना पड़ सकता है, क्योंकि संसद द्वारा पारित ऐसा कोई कानून नहीं है जो इसे जरूरी बनाता हो। यह ज्यादातर एक परंपरा का मामला है।”

थरूर ने कहा, “हम सभी वंदे मातरम् का सम्मान करते हैं। मैं खुशी-खुशी आपके लिए इसे गा सकता हूं।” नई दिल्ली में उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन की मौजूदगी में हुए एक पुस्तक विमोचन कार्यक्रम का जिक्र करते हुए थरूर ने बताया कि उस कार्यक्रम की शुरुआत और आखिर दोनों ही समय पूरा गीत बजाया गया था।

‘आपसी सहमति से होगा समाधान’

उन्होंने कहा, “दर्शकों के लिए एक अपेक्षाकृत अनजान और लंबे गाने के दौरान दो बार खड़े रहना एक समस्या बन गया।” इस विवाद को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए उन्होंने उम्मीद जताई कि इसका समाधान आपसी सहमति से हो जाएगा।

उन्होंने कहा, “मैं समझ सकता हूं कि राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति या प्रधानमंत्री से जुड़े औपचारिक मौकों पर इसे एक बार गाया जाए। लेकिन, एक छोटे से कार्यक्रम में पूरे गाने को दो बार गाना मेरी समझ से बाहर है। मुझे इसका कोई तर्क नजर नहीं आता और न ही यह कोई बहुत कुशल तरीका है।”

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *