सिंधिया राजघराने के बहुचर्चित संपत्ति विवाद में 78 वर्ष पुराना द कोवेनेंट (अनुबंध) दस्तावेज फिर केंद्र में आ गया है। 1948 में जब ग्वालियर, इंदौर और मालवा की रियासतों को मिलाकर संयुक्त राज्य मध्य भारत का गठन इसी कोवेनेंट के आधार पर किया गया था।
इस अनुबंध में तत्कालीन शासकों की परिषद के गठन का प्रविधान किया गया। इसके प्रथम राजप्रमुख ग्वालियर के महाराजा को और वरिष्ठ उपाध्यक्ष इंदौर के महाराजा को बनाया गया।
अब यही ऐतिहासिक दस्तावेज अदालत में यह तय करने के लिए अहम माना जा रहा है कि सिंधिया राजघराने का किन संपत्तियों पर निजी स्वामित्व रह गया था और कौन-सी संपत्तियां मध्य भारत के गठन में राज्य को हस्तांतरित की गई थीं।
ग्वालियर जिला न्यायालय में लंबित संपत्ति विवाद के निस्तारण के लिए 28 जुलाई को होने वाली अगली सुनवाई में यह कोवेनेंट महत्वपूर्ण आधार बनेगा।
दरअसल, कुछ संपत्तियां ऐसी हैं, जिनका बंटवारा सिंधिया राजपरिवार के उत्तराधिकारियों के बीच अभी भी विवाद का कारण बना हुआ है। इन पर केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनकी बुआ राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे व मध्य प्रदेश की पूर्व मंत्री यशोधरा राजे समेत परिवार के कई सदस्य अपना दावा कर चुके हैं।
ऐसे में इस कोवेनेंट के आधार पर अदालत यह देखेगी कि सिंधिया राजपरिवार के पास मध्य भारत के गठन के समय कौन-कौन सी निजी संपत्तियां रह गई थीं।
बता दें कि मध्य भारत राज्य के गठन के लिए तैयार किए गए इस कोवेनेंट पर ग्वालियर के तत्कालीन महाराजा जीवाजीराव सिंधिया, इंदौर के महाराजा यशवंतराव होलकर, धार के महाराजा आनंदराव पवार, अलीराजपुर के महाराजा सुरेंद्र सिंह, बड़वानी के राणा देवी सिंह तथा भारत सरकार के रियासत मंत्रालय के सचिव वीपी मेनन ने हस्ताक्षर किए थे।
दस्तावेज में यह स्पष्ट किया गया था कि कौन-सी संपत्तियां शासकों की निजी रहेंगी और कौन-सी नई सरकार को हस्तांतरित की जाएंगी।
ऊटी से काशी और गोवा तक का जिक्र-कोवेनेंट में जीवाजीराव सिंधिया की निजी संपत्तियों का विस्तृत उल्लेख है। इनमें ग्वालियर के अलावा काशी का गंगा महल, ऊटी के कई लाज और बंगले, गोवा की संपत्तियां तथा मुंबई के दादर, धोबी तालाब, गवालिया टैंक रोड और वर्ली स्थित प्रसिद्ध समुद्र महल भी शामिल हैं।
दरअसल, यही संपत्तियां वर्तमान विवाद में प्रमुख विषय बनी हुई हैं।मंदिर और छतरियों का भी उल्लेख-दस्तावेज में सिंधिया राजवंश से जुड़े धार्मिक और सांस्कृतिक स्थलों का भी उल्लेख किया गया है।
इनमें छतरी बाजार स्थित शाही छतरियां, विठ्ठल मंदिर, कोटेश्वर, भूतेश्वर मंदिर, उज्जैन के द्वारकाधीश और मदनमोहन मंदिर तथा काशी स्थित गंगा महल के प्रबंधन का अधिकार राजपरिवार के पास रहने का उल्लेख मिलता है।
सरकार को सौंपी गई थीं ये संपत्तियां-कोवेनेंट के तहत सार्वजनिक उपयोग के लिए कई महत्वपूर्ण अचल संपत्तियां तत्कालीन मध्य भारत सरकार को सौंपी गई थीं।
इनमें मोती महल पैलेस, गोरखी पैलेस, सरस्वती महल, जल विहार, गेंदघर, तिघरा कोठी, ग्वालियर किले की गद्दी बैरक, भदैया कुंड और शिवपुरी का फूलबाग शामिल हैं।