विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा है कि वैज्ञानिक प्रगति को लंबे समय से ‘संकीर्ण दृष्टिकोण’ से देखा गया है जबकि जबकि भारत की प्राचीन गणितीय विरासत आधुनिक विज्ञान और तकनीक की नींव है। उन्होंने ऐतिहासिक गलत धारणाओं को ‘ठीक’ करने और भारत के योगदान को मान्यता देने पर जोर दिया।
एस. जयशंकर ने तीसरी शताब्दी में भारत में विकसित बाइनरी प्रणाली का उदाहरण दिया, जिसकी नींव पर डिजिटल युग और विश्व की आर्टिफिशियल या एआइ का भविष्य टिका है।
विदेश मंत्री जयशंकर ने गणित के क्षेत्र में भारत के योगदान को दर्शाने वाली प्रदर्शनी का उद्घाटन करते हुए ये बातें कहीं। संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी मिशन द्वारा आयोजित ‘शून्य से अनंत तक – गणित में भारतीय सभ्यता का योगदान’ शीर्षक वाली प्रदर्शनी का आयोजन भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद ने भारत अंतरराष्ट्रीय केंद्र के सहयोग से किया है।
वैज्ञानिक प्रगति के वैश्विक नैरेटिव का संकीर्ण दृष्टिकोण
जयशंकर ने सोमवार को संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में ‘ऐतिहासिक, अपनी तरह की पहली’ गणित प्रदर्शनी का उद्घाटन करते हुए कहा, हम आधुनिक इतिहास के परिप्रेक्ष्य को देखें, तो वैज्ञानिक प्रगति के वैश्विक नैरेटिव को बहुत लंबे समय से संकीर्ण दृष्टिकोण से देखा गया है।
जयशंकर ने कहा, भू-राजनीतिक उथल-पुथल के कारण राजनीतिक और आर्थिक अदलाव हो रहा है, और यह अनिवार्य रूप से सांस्कृतिक पुनर्संतुलन का मार्ग भी प्रशस्त कर रहा है और यह विविध दृष्टिकोणों के लिए स्थान बनाकर किया जाएगा ताकि अतीत को ज्यादा व्यापक तरीके से समझा जा सके।
जयशंकर ने दो से 10 मई तक जमैका, सूरीनाम और त्रिनिदाद और टोबैगो की आधिकारिक यात्रा पर थे। न्यूयार्क में अपने संक्षिप्त दौरे के दौरान उन्होंने सोमवार को इस प्रदर्शनी का उद्घाटन किया।
यह प्रदर्शनी ‘सम्हिता’ (दक्षिण एशियाई पांडुलिपियों का इतिहास और दस्तावेज संग्रह) परियोजना का हिस्सा है, जिसे इंडिया इंटरनेशनल सेंटर संचालित कर रहा है।
भारत के अमेरिका में राजदूत विनय मोहन क्वात्रा, न्यूयार्क में भारत के महावाणिज्यदूत बिनय प्रधान, प्रिंसटन विश्वविद्यालय में गणित के प्रोफेसर और फील्ड्स मेडल से सम्मानित मंजुल भार्गव, साथ ही संयुक्त राष्ट्र के राजदूत, राजनयिक और वरिष्ठ अधिकारी उद्घाटन समारोह में उपस्थित थे।
गणित के क्षेत्र भारत के योगदान को दर्शाती है यह प्रदर्शनी विशेष प्रदर्शनी गणित के क्षेत्र भारत के योगदान को दर्शाती है। भारत की प्राचीन गणितीय अवधारणाएं सहस्त्राब्दियों से दुनिया भर में फैली हैं। इनमें शून्य, दशमलव स्थान मान प्रणाली, बीजगणित और एल्गोरिदम से लेकर ग्रहीय माडल, खगोलीय गणना, संयोजन विज्ञान और ज्यामिति – ‘बौधायन-पाइथागोरस प्रमेय’ तक शामिल हैं।
प्रदर्शनी में आर्यभट्ट, ब्रह्मगुप्त और भास्कर जैसे विद्वानों की परंपरा को भी सम्मान दिया गया। जयशंकर ने कहा, हम एक ऐसी सभ्यता का अवलोकन कर रहे हैं जिसका उद्गम भारत की बौद्धिक भूमि में हुआ।
प्रौद्योगिकी के लोकतंत्रीकरण, वास्तव में, विश्व के लोकतंत्रीकरण के लिए इतिहास का लोकतंत्रीकरण आवश्यक है। अतीत की विकृतियों को सुधारकर ही हम भविष्य के मुद्दों का सटीक समाधान कर सकते हैं। जब तक अतीत की गलत धारणाओं को ठीक नहीं किया जाएगा, तब तक भविष्य की चुनौतियों को सही तरीके से नहीं समझा जा सकेगा।
विदेश मंत्री ने कहा, विविध और लोकतांत्रिक समुदाय का निर्माण एक आयामी ²ष्टिकोण पर नहीं किया जा सकता। कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआइ के दौर में अतीत की सही समझ और भी अहम हो जाएगी। उन्होंने आशा जताई कि यह प्रदर्शनी प्रौद्योगिकी को अपनाने के बारे में पूर्वाग्रहों और धारणाओं को दूर करने में भी मदद करेगी।
यह प्रदर्शनी याद दिलाती है कि गणित सार्वभौमिक भाषा है और इसका प्रसार पूरी दुनिया के हित में रहा है। संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि राजदूत पर्वतनेनी हरीश ने कहा कि गणित सार्वभौमिक है और विविध सभ्यताओं ने इसे समृद्ध किया है।
हरीश ने कहा, यह मानवता को बांटने करने के बजाय उसे एकजुट करता है। यह प्रदर्शनी दुनिया को याद दिलाती है कि भारत में गणित ने कला, वास्तुकला, संगीत और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति को आकार दिया है।
भारत ने हमेशा से अपना ज्ञान पूरी दुनिया के लिए उपलब्ध कराया है। आज जिस ‘ओपन सोर्स’ की बात होती है, वह भारत में प्राचीन समय से ही एक विचारधारा रही है। संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में इस प्रदर्शनी का आयोजन 11 से 15 मई तक होगा।