नीतीश और सम्राट दोनों के करीबी बने रत्नेश सादा, दिहाड़ी मजदूर के बेटे से मंत्री बनने तक का संघर्षभरा…

बिहार की राजनीति में कुछ नेता ऐसे होते हैं, जिनकी पहचान केवल पद से नहीं बल्कि संघर्ष, सादगी और जनता से जुड़ाव से बनती है। सहरसा जिले के सोनवर्षा विधानसभा क्षेत्र से लगातार चार बार विधायक चुने गए रत्नेश सादा ऐसे ही नेताओं में शामिल हैं।

बिहार सरकार में एक बार फिर मंत्री पद की जिम्मेदारी मिलने के साथ ही रत्नेश सादा का राजनीतिक कद और मजबूत हुआ है। वे अब तीसरी बार मंत्री बने हैं। खास बात यह है कि वे सहरसा जिले के ऐसे एकमात्र विधायक हैं, जिन्होंने लगातार चार चुनाव जीतकर अपनी मजबूत जनाधार वाली राजनीति को साबित किया है।

दियारा के छोटे गांव से राजनीति तक का सफर

कोसी दियारा क्षेत्र के कुंदह पंचायत अंतर्गत बलिया सिमर गांव से आने वाले रत्नेश सादा का जीवन संघर्षों से भरा रहा है। उनका परिवार बेहद साधारण पृष्ठभूमि से आता है। उनके पिता दिहाड़ी मजदूर थे और कठिन परिस्थितियों में परिवार का पालन-पोषण करते थे। इन्हीं हालातों के बीच पले-बढ़े रत्नेश सादा ने समाज के वंचित और महादलित वर्गों के लिए काम करने का संकल्प लिया।

1987 से शुरू हुई राजनीतिक यात्रा

रत्नेश सादा ने अपनी राजनीतिक यात्रा वर्ष 1987 में शुरू की थी। वे जदयू के महादलित प्रकोष्ठ के अध्यक्ष भी रहे। संगठन में सक्रियता और समाज के बीच मजबूत पकड़ के कारण धीरे-धीरे वे पार्टी नेतृत्व की नजर में आए।

वर्ष 2009 में उन्होंने सहरसा के पटेल मैदान में महादलितों का एक बड़ा सम्मेलन आयोजित किया। इस सम्मेलन ने उन्हें राज्य स्तर की राजनीति में नई पहचान दिलाई। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और जदयू नेतृत्व ने उनकी राजनीतिक क्षमता को गंभीरता से लेना शुरू किया।

2010 में पहली जीत और फिर कभी पीछे नहीं देखा

वर्ष 2010 में सोनवर्षा विधानसभा सीट को सुरक्षित घोषित किया गया। जदयू ने इस सीट से रत्नेश सादा को उम्मीदवार बनाया। उन्होंने भारी बहुमत से जीत दर्ज की और पहली बार विधायक बने। इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। 2015, 2020 और 2025 में लगातार जीत दर्ज कर वे चौथी बार विधानसभा पहुंचे।

मंत्री पद तक पहुंचा राजनीतिक कद

लगातार जनसमर्थन और संगठन के प्रति समर्पण के कारण उन्हें सरकार में भी अहम जिम्मेदारियां मिलीं। तीसरी बार विधायक बनने के बाद उन्हें अनुसूचित जाति एवं जनजाति कल्याण मंत्री बनाया गया। इसके बाद वे निबंधन एवं मद्य निषेध विभाग की जिम्मेदारी भी संभाल चुके हैं। अब एक बार फिर उन्हें मंत्री पद की जिम्मेदारी देकर पार्टी ने उन पर भरोसा जताया है।

टिकट कटने के बाद नीतीश कुमार ने किया हस्तक्षेप

2025 विधानसभा चुनाव के दौरान एक समय ऐसा भी आया जब गठबंधन के तहत सोनवर्षा सीट दूसरे दल के खाते में चली गई और रत्नेश सादा का टिकट कट गया। लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने खुद हस्तक्षेप किया। उन्होंने रत्नेश सादा को अपने आवास पर बुलाया और फिर उन्हें दोबारा टिकट देकर चुनाव मैदान में उतारा। रत्नेश सादा ने चौथी बार जीत हासिल कर पार्टी के फैसले को सही साबित कर दिया।

सादगी आज भी पहचान

मंत्री और विधायक बनने के बाद भी रत्नेश सादा के स्वभाव में कोई बदलाव नहीं आया। वे आज भी सरल और सहज जीवनशैली के लिए पहचाने जाते हैं। स्थानीय लोग बताते हैं कि वे आम लोगों से उसी आत्मीयता के साथ मिलते हैं, जैसे पहले मिला करते थे। यही कारण है कि कोसी क्षेत्र में उनकी लोकप्रियता लगातार बनी हुई है।

पार्टी में बढ़ता कद

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि लगातार चार बार जीत और तीसरी बार मंत्री बनना इस बात का संकेत है कि जदयू नेतृत्व उन्हें महादलित राजनीति के मजबूत चेहरे के रूप में देखता है। पार्टी के प्रति उनकी निष्ठा और जमीनी पकड़ ने उन्हें बिहार की राजनीति में एक महत्वपूर्ण स्थान दिलाया है।

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