रायपुर : परती भूमि बनी कमाई का जरिया, कृषि विज्ञान केंद्र बालोद की पहल से किसान की बढ़ी आय…

उन्नत तिल उत्पादन तकनीक अपनाकर लगभग दोगुनी हुई उपज

‘उन्नत रामा’ किस्म और वैज्ञानिक खेती से 95.83 प्रतिशत अधिक उत्पादन, अन्य किसानों के लिए बना प्रेरणादायी मॉडल

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के क्लस्टर फ्रंट लाइन डेमॉन्स्ट्रेशन (सीएफएलडी) तिलहन कार्यक्रम के अंतर्गत कृषि विज्ञान केंद्र, बालोद द्वारा किसानों की आय बढ़ाने तथा परती भूमि के बेहतर उपयोग की दिशा में किए जा रहे प्रयासों के उत्साहजनक परिणाम सामने आए हैं।

बालोद जिले के ग्राम पुसावाड़ के प्रगतिशील किसान श्री भुवन लाल ने कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों के मार्गदर्शन में परती भूमि पर तिल की उन्नत खेती कर न केवल लगभग दोगुना उत्पादन प्राप्त किया, बल्कि अपनी शुद्ध आय में भी उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की।

वैज्ञानिक पद्धति से तिल की खेती

         पूर्व में श्री भुवन लाल अपने खेत के एक हिस्से को परती छोड़ देते थे, जिससे भूमि का समुचित उपयोग नहीं हो पाता था। कृषि विज्ञान केंद्र बालोद के वैज्ञानिकों ने उन्हें परती भूमि में तिल की उन्नत किस्म ‘उन्नत रामा’ की खेती करने की सलाह दी और आधुनिक उत्पादन तकनीकों का प्रशिक्षण एवं सतत तकनीकी मार्गदर्शन प्रदान किया। किसान ने वैज्ञानिक सलाह पर अमल करते हुए पहली बार वैज्ञानिक पद्धति से तिल की खेती शुरू की।

कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों ने दी तकनीकी सलाह

         प्रदर्शन के दौरान किसान को सीड-कम-फर्टिलाइजर ड्रिल से कतारबद्ध बुवाई, ट्राइकोडर्मा एवं जैव उर्वरकों से बीज उपचार, संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन, समय पर खरपतवार नियंत्रण तथा रोग एवं कीटों के समेकित प्रबंधन की उन्नत तकनीकों को अपनाने के लिए प्रेरित किया गया। रोग नियंत्रण के लिए टेबुकोनाजोल एवं सल्फर तथा कीट नियंत्रण के लिए अनुशंसित मात्रा में प्रोफेनोफॉस का उपयोग कराया गया। कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों ने बुवाई से लेकर कटाई तक नियमित रूप से खेत का निरीक्षण कर आवश्यक तकनीकी सलाह भी उपलब्ध कराई।

लगभग दोगुना उत्पादन, चार गुना से अधिक बढ़ी आय

        वैज्ञानिक पद्धति अपनाने का परिणाम अत्यंत सकारात्मक रहा। पारंपरिक खेती से जहां किसान को मात्र 2.40 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उत्पादन प्राप्त होता था, वहीं उन्नत तकनीकों के उपयोग से उपज बढ़कर 4.70 क्विंटल प्रति हेक्टेयर हो गई, जो 95.83 प्रतिशत अधिक है। इसी प्रकार किसान की शुद्ध आय 4 हजार रुपये प्रति हेक्टेयर से बढ़कर 16,600 रुपये प्रति हेक्टेयर हो गई। लाभ-लागत अनुपात भी 1.38 से बढ़कर 2.43 तक पहुंच गया, जिससे कम लागत में अधिक उत्पादन और बेहतर लाभ की संभावना सिद्ध हुई।

अनुभव से बढ़ा विश्वास, अब करेंगे अधिक क्षेत्र में खेती

          किसान श्री भुवन लाल ने बताया कि पहले उन्हें विश्वास नहीं था कि परती भूमि में तिल की खेती से इतना अच्छा लाभ मिल सकता है। कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों के मार्गदर्शन में आधुनिक तकनीकों को अपनाने के बाद उन्हें अपेक्षा से कहीं अधिक उत्पादन और आर्थिक लाभ मिला। उन्होंने कहा कि अब वे अधिक क्षेत्र में तिल की खेती करेंगे तथा आसपास के किसानों को भी वैज्ञानिक खेती अपनाने के लिए प्रेरित करेंगे।

परती भूमि का सदुपयोग बढ़ाएगा किसानों की आय

         कृषि विज्ञान केंद्र बालोद के वैज्ञानिकों ने बताया कि जिले में खरीफ मौसम के दौरान बड़ी मात्रा में भूमि परती रह जाती है। यदि किसान ऐसी भूमि में तिल जैसी कम अवधि एवं कम पानी में सफल होने वाली तिलहनी फसलों की उन्नत किस्मों का वैज्ञानिक पद्धति से उत्पादन करें, तो उनकी आय में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है। साथ ही तिलहन उत्पादन बढ़ने से खाद्य तेलों के क्षेत्र में देश की आत्मनिर्भरता को भी मजबूती मिलेगी।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *