हॉर्मुज खुलने से क्रूड ऑयल की कीमतों पर दबाव, पेट्रोल-डीजल सस्ता होने की बढ़ी उम्मीद…

दुनिया के सबसे अहम तेल मार्गों में शामिल हॉर्मुज स्ट्रेट (Strait of Hormuz) अगर फिर से पूरी तरह खुल जाता है, तो वैश्विक तेल बाजार में सप्लाई की ऐसी बाढ़ आ सकती है, जिसकी मिसाल पहले कभी नहीं देखी गई। विशेषज्ञों का मानना है कि इसके बाद कच्चे तेल की कीमतों पर भारी दबाव पड़ सकता है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल सस्ता हो सकता है। ऐसे में भारत जैसे बड़े आयातक देशों के लिए भी राहत की उम्मीद बढ़ सकती है।

हॉर्मुज स्ट्रेट को लंबे समय से वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की लाइफलाइन माना जाता है। इस समुद्री रास्ते में रुकावट आने के बाद खाड़ी देशों को करीब 10,000 तेल कुओं का उत्पादन सीमित या बंद करना पड़ा था। इससे दुनिया के कुल तेल उत्पादन का लगभग 15% हिस्सा प्रभावित हुआ।

अभी क्या हैं क्रूड और ब्रेंट के ताजा रेट?

वैश्विक बाजार कॉमेक्स पर क्रूड ऑयल 1.56 फीसदी यानी 1.42 डॉलर गिरावट (crude price crash) के साथ 89.88 डॉलर प्रति बैरल (crude price today) पर कारोबार कर रहा है। वहीं ब्रेंट में 1.26 फीसदी की गिरावट दर्ज हुई है। ब्रेंट की कीमत 1.19 डॉलर गिरकर 93 डॉलर प्रति बैरल (crude rate today)पर कारोबार कर रहा है। भारतीय घरेलू बाजार एमसीएक्स की बात करें तो यहां क्रूड 120 रुपए सस्ता होकर 8578 रुपए प्रति बैरल पर ट्रेड कर रहा है। कारोबारी सत्र के दौरान इसका हाई लेवल 8679 रुपए और लो लेवल 8578 रुपए प्रति बैरल रहा।

32 मिलियन बैरल से घटकर 17.5 मिलियन बैरल प्रतिदिन

इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) के आंकड़ों के अनुसार, हॉर्मुज में संकट के बाद सऊदी अरब, इराक, ईरान, यूएई, कुवैत, कतर और बहरीन का संयुक्त तेल उत्पादन करीब 45% घट गया। युद्ध से पहले जहां ये देश लगभग 3.2 करोड़ बैरल प्रतिदिन तेल निकाल रहे थे, वहीं उत्पादन घटकर करीब 1.75 करोड़ बैरल प्रतिदिन रह गया।

अब अगर अमेरिका और ईरान के बीच कोई समझौता होता है और टैंकरों की आवाजाही सामान्य होती है, तो बंद पड़ा उत्पादन बहुत तेजी से बाजार में लौट सकता है।

कुछ दिनों में लौट सकती है आधी सप्लाई

तेल बाजार में इस बात को लेकर मतभेद हैं कि उत्पादन सामान्य होने में कितना समय लगेगा। कुछ विश्लेषकों का कहना है कि इसमें 6 महीने से 1 साल तक लग सकता है। हालांकि उद्योग से जुड़े कई विशेषज्ञों का अनुमान है कि उत्पादन वापसी उम्मीद से कहीं ज्यादा तेज होगी।

उनके मुताबिक, खाड़ी क्षेत्र की लगभग 50% उत्पादन क्षमता कुछ ही दिनों में वापस आ सकती है। कुछ हफ्तों के भीतर करीब 75% क्षमता फिर से चालू हो सकती है, जबकि पूरी क्षमता बहाल होने में कुछ महीने लग सकते हैं।

क्यों आसान हो सकता है उत्पादन शुरू करना?

इस बार स्थिति पहले के कई युद्धों से अलग है। खाड़ी क्षेत्र के अधिकांश तेल कुएं, प्रोसेसिंग सेंटर, पाइपलाइन, स्टोरेज टैंक और निर्यात बंदरगाह बड़े पैमाने पर सुरक्षित रहे हैं। जहां नुकसान हुआ भी, वहां युद्धविराम के दौरान मरम्मत कर ली गई।

1991 में कुवैत युद्ध के दौरान तेल कुओं में आग लग गई थी, जबकि इस बार ऐसा नहीं हुआ। साथ ही तेल क्षेत्रों में नियमित रखरखाव भी जारी रखा गया। कई कुओं को पूरी तरह बंद करने के बजाय कम उत्पादन पर चलाया गया ताकि दोबारा शुरू करने में तकनीकी दिक्कतें न आएं।

टैंकरों की भी नहीं होगी कमी

तेल की सप्लाई बढ़ाने के लिए सिर्फ उत्पादन ही नहीं, बल्कि परिवहन भी जरूरी है। अच्छी बात यह है कि कई बड़ी शिपिंग कंपनियां पहले से तैयार बैठी हैं। दुनिया की प्रमुख सुपरटैंकर कंपनियों के अनुसार, फारस की खाड़ी के आसपास दर्जनों बड़े तेल टैंकर खाली खड़े हैं और हॉर्मुज खुलने का इंतजार कर रहे हैं।

अनुमान है कि करीब 55 बड़े टैंकर क्षेत्र के पास मौजूद हैं, जिनकी कुल क्षमता लगभग 11 करोड़ बैरल तेल ढोने की है। यानी जैसे ही रास्ता खुलेगा, तेल की शिपमेंट तेजी से शुरू हो सकती है।

OPEC+ कोटा भी बनेगा अहम फैक्टर

एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि युद्ध से पहले भी कई खाड़ी देश अपनी पूरी क्षमता पर उत्पादन नहीं कर रहे थे। OPEC+ की उत्पादन सीमाओं के कारण सऊदी अरब जैसे देशों ने जानबूझकर उत्पादन कम रखा हुआ था।

उदाहरण के लिए, सऊदी अरब की उत्पादन क्षमता करीब 1.25 करोड़ बैरल प्रतिदिन है, लेकिन युद्ध से पहले वह लगभग 1.04 करोड़ बैरल प्रतिदिन तेल ही निकाल रहा था। इसका मतलब है कि जरूरत पड़ने पर उसके पास उत्पादन बढ़ाने की अतिरिक्त क्षमता मौजूद है।

भारत के लिए क्या मायने?

भारत अपनी जरूरत का 85% से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल सस्ता होने का सीधा फायदा देश को मिल सकता है। अगर हॉर्मुज खुलने के बाद वैश्विक सप्लाई तेजी से बढ़ती है और ब्रेंट क्रूड की कीमतों में गिरावट आती है, तो भारत का आयात बिल कम हो सकता है।

हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि पेट्रोल और डीजल तुरंत सस्ते हो जाएंगे। भारत में ईंधन की कीमतें सिर्फ कच्चे तेल पर नहीं, बल्कि टैक्स, रिफाइनिंग लागत, मार्केटिंग मार्जिन और सरकारी नीतियों पर भी निर्भर करती हैं। फिर भी लंबे समय तक सस्ता क्रूड बना रहता है तो उपभोक्ताओं को राहत मिलने की संभावना बढ़ जाएगी।

कुल मिलाकर, हॉर्मुज स्ट्रेट का दोबारा खुलना सिर्फ एक समुद्री रास्ते की बहाली नहीं होगा, बल्कि यह वैश्विक तेल बाजार की दिशा बदलने वाली घटना साबित हो सकती है। अगर राजनीतिक हालात सामान्य होते हैं, तो दुनिया को कुछ ही हफ्तों में तेल की कमी से तेल की बाढ़ वाली स्थिति देखने को मिल सकती है।

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