गुलाम जम्मू-कश्मीर में हक की आवाज बुलंद कर रहे लोगों को खामोश करने के लिए पाकिस्तानी हुक्मरान और सेना किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं।
खुफिया रिपोर्टों के मुताबिक, सुलगते गुलाम जम्मू-कश्मीर में जारी प्रदर्शनों को हमेशा के लिए दमन की आग में झोंकने के लिए पाकिस्तानी प्रशासन ‘ज्वाइंट अवामी एक्शन कमेटी’ (जेएएसी) के शीर्ष नेतृत्व का खात्मा करने की भयानक साजिश रच रहा है।
बढ़ती महंगाई, राजनीतिक भेदभाव और प्रशासनिक उपेक्षा के खिलाफ महीनों से मोर्चा संभाले जेएएसी के हौसले पाकिस्तान आर्मी चीफ जनरल आसिम मुनीर की धमकियों के आगे भी डिगे नहीं हैं।
जेएएसी उस आंदोलन का नेतृत्व कर रही है जो इस क्षेत्र के लोगों को सम्मानजनक जीवन देने में पाकिस्तानी प्रशासन की लगातार नाकामी के खिलाफ हो रहा है।
मौत के साये में भी अटूट हौसला
खुफिया अधिकारियों के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय मंच पर किरकिरी होने से बौखलाए आर्मी चीफ मुनीर सरकार पर दबाव बना रहे हैं कि जनता की मांगें न मानी जाएं, बल्कि बलप्रयोग से आंदोलन को कुचल दिया जाए। सैन्य नेतृत्व का सब्र अब जवाब दे चुका है, और किसी भी वक्त जेएएसी के नेताओं की हत्या के आदेश दिए जा सकते हैं।
इस जानलेवा खतरे से वाकिफ आंदोलनकारी नेताओं ने अवाम से बेहद भावुक अपील की है। उन्होंने कहा, ‘अगर हमें मार भी दिया जाए, तो भी यह आंदोलन रुकना नहीं चाहिए। हमारे बाद यह अवाम की खुद की जंग बन जाए।’ नेताओं का यह जज्बा दर्शाता है कि वे हक की खातिर जान न्योछावर करने को तैयार हैं, लेकिन झुकने को नहीं।
गोलियों और नाकाबंदी के बीच मुजफ्फराबाद कूच को तैयार अवाम
हालात और भी बदतर हो सकते हैं क्योंकि जेएएसी ने भारी नाकाबंदी और ‘देखते ही गोली मारने’ की सैन्य चेतावनियों के बावजूद मुजफ्फराबाद को घेरने का ऐलान किया है। इस ऐतिहासिक मार्च में महिलाएं और बच्चे भी शामिल हो रहे हैं, जिन्हें पहले भी पाक सुरक्षाबलों की बर्बरता का सामना करना पड़ा है।
भारत ने गुलाम जम्मू-कश्मीर में जारी इस जुल्म पर गहरी चिंता जताई है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि पाकिस्तान जायज मांगों को सुनने के बजाय इंटरनेट बंद कर, खाना-दवाई रोककर और निहत्थे नागरिकों पर घातक बलप्रयोग कर क्रूरता की सारी हदें पार कर रहा है।
एक्टिविस्टों की नजरबंदी पर एमनेस्टी ने उठाए सवाल
मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल ने पाकिस्तानी प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि वहां शांतिपूर्ण विरोध की आवाज को कुचलने के लिए प्रशासनिक नजरबंदी कानूनों का सहारा लिया जा रहा है।
इसने ‘पश्तून तहफ्फुज मूवमेंट’ (पीटीएम) के नेता जुबैर शाह आगा, बलूच एक्टिविस्ट सैयद बीबी बलूच और पत्रकार अहमद फरहाद की तत्काल रिहाई की मांग की है। जुबैर आगा को 28 जून को क्वेटा में बलूच एक्टिविस्ट माहरंग बलूच की सजा के खिलाफ आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद मनमाने ढंग से हिरासत में लिया गया था।
एमनेस्टी के अनुसार, उन्हें ‘मेंटेनेंस आफ पब्लिक आर्डर’ (एमपीओ) कानून के तहत कैद रखा गया है। बिना किसी उचित कानूनी प्रक्रिया के मानवाधिकार रक्षकों और पत्रकारों की आजादी छीनना, वहां की सरकार का एक खतरनाक हथियार बन चुका है।