ऑक्सफोर्ड की चेतावनी: यदि तापमान 2 डिग्री बढ़ा, तो दुनिया का आधा हिस्सा झेलेगा जानलेवा गर्मी; भारत की स्थिति भी गंभीर होगी…

ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के ताजा अध्ययन ने दुनिया को एक डरावनी तस्वीर दिखाई है। अगर वैश्विक तापमान औद्योगिक क्रांति से पहले के स्तर से 2 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ गया – जो अब वैज्ञानिकों के अनुसार काफी संभावित है – तो 2050 तक दुनिया की लगभग आधी आबादी (करीब 3.79 अरब लोग) अत्यधिक खतरनाक गर्मी का सामना करेगी। यह संख्या 2010 के 23% (1.54 अरब) से बढ़कर 41% तक पहुंच सकती है।

एक जर्नल में प्रकाशित हुआ है, बताता है कि पेरिस समझौते की 1.5 डिग्री की सीमा पार करने से पहले ही ज्यादातर प्रभाव दिखने लगेंगे। शोधकर्ताओं के अनुसार, गर्मी का जोखिम तेजी से बढ़ रहा है, और अनुकूलन के उपायों को अभी से लागू करना होगा।

भारत सबसे ज्यादा प्रभावित देशों में शामिल

भारत, नाइजीरिया, इंडोनेशिया, बांग्लादेश, पाकिस्तान और फिलीपींस जैसे घनी आबादी वाले देशों में सबसे ज्यादा लोग इस जानलेवा गर्मी से प्रभावित होंगे।

मध्य अफ्रीकी गणराज्य, नाइजीरिया, दक्षिण सूडान, लाओस और ब्राजील में खतरनाक तापमान में सबसे तेज वृद्धि होने की आशंका है। भारत पर इसका गंभीर असर पड़ेगा, जहां पहले से ही हीटवेव मौतें बढ़ रही हैं, और भविष्य में स्वास्थ्य, कृषि, ऊर्जा और जीवनशैली पर भारी संकट मंडराएगा।

ठंडे देश भी नहीं बचेंगे

आश्चर्यजनक रूप से, ठंडे देशों में भी बदलाव नाटकीय होगा। स्विट्जरलैंड, कनाडा, ब्रिटेन, स्वीडन, फिनलैंड, नॉर्वे और आयरलैंड जैसे देशों में गर्म दिनों की संख्या 100% से 230% तक बढ़ सकती है।

इन देशों की इमारतें, परिवहन और ऊर्जा सिस्टम मुख्य रूप से ठंड सहने के लिए बने हैं, गर्मी झेलने के लिए नहीं। नतीजा? अगले कुछ वर्षों में लाखों घरों में एयर कंडीशनिंग लगानी पड़ सकती है।

प्रमुख लेखक डॉ. जीसस लिजाना (एसोसिएट प्रोफेसर, इंजीनियरिंग साइंस) ने कहा, “हमारे अध्ययन से साफ है कि शीतलन और तापन की मांग में ज्यादातर बदलाव 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा तक पहुंचने से पहले ही हो जाएंगे। नीति-निर्माताओं को अभी से बड़े पैमाने पर अनुकूलन उपाय अपनाने होंगे।”

व्यापक प्रभाव और चेतावनी

डॉ. राधिका खोसला (ऑक्सफोर्ड मार्टिन फ्यूचर ऑफ कूलिंग प्रोग्राम की प्रमुख) ने इसे ‘वेक-अप कॉल’ बताया। उन्होंने कहा, “1.5 डिग्री से ज्यादा गर्मी शिक्षा, स्वास्थ्य, प्रवासन और कृषि पर अभूतपूर्व असर डालेगी। शीतलन की मांग बढ़ने से उत्सर्जन भी बढ़ सकता है, जो समस्या को और गहरा करेगा।”

अध्ययन की मांग है कि भवनों को तेजी से डीकार्बोनाइज किया जाए और लचीली अनुकूलन रणनीतियां अपनाई जाएं, ताकि नेट-जीरो लक्ष्य हासिल हो सके।

अन्यथा, 2050 की दुनिया में गर्मी सिर्फ असुविधा नहीं, बल्कि बड़े पैमाने पर मौतों, प्रवासन और आर्थिक संकट का कारण बनेगी।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *