वर्षा वर्मा (समाज सेविका) :
समाज सेवा केवल शब्दों से नहीं, बल्कि कठिन परिस्थितियों में निभाए गए कर्तव्यों से परिभाषित होती है। ऐसी ही संवेदनशील और मानवीय पहल कर रही है “एक कोशिश ऐसी भी” संस्था, जिसे अब तक चार लावारिस शवों के अंतिम संस्कार की सेवा करने का अवसर प्राप्त हुआ है। संस्था का कहना है कि यह सेवा उन्हें प्रभु की ओर से मिली जिम्मेदारी के रूप में स्वीकार है, जिसे वे पूरी निष्ठा और सामर्थ्य के साथ निभाने का प्रयास कर रहे हैं।
संस्था से जुड़े सदस्यों का मानना है कि अंतिम संस्कार केवल एक धार्मिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि मानव जीवन का अंतिम सम्मान भी है। भारतीय परंपरा और हिंदू धर्म में अंतिम संस्कार को 16वां संस्कार माना गया है, जिसे अत्यंत महत्वपूर्ण और पवित्र माना जाता है।
इसी संदर्भ में समाज में प्रचलित मान्यताओं का उल्लेख करते हुए संस्था ने बताया कि परंपरागत रूप से महिलाओं के श्मशान घाट जाने को लेकर कई धार्मिक और सामाजिक धारणाएं रही हैं। गरुड़ पुराण सहित विभिन्न धार्मिक ग्रंथों में यह उल्लेख मिलता है कि महिलाओं का स्वभाव अधिक कोमल और संवेदनशील माना जाता है, इसलिए ऐसे भावनात्मक अवसरों पर उनके अधिक विचलित होने की संभावना रहती है। हालांकि, संस्था ने स्पष्ट किया कि यह केवल धार्मिक और सामाजिक मान्यताओं पर आधारित जानकारी है, जिसकी सत्यता या असत्यता पर वे कोई टिप्पणी नहीं करते।
संस्था का कहना है कि उनका मुख्य उद्देश्य केवल मानवता की सेवा करना है। जिन लोगों का इस दुनिया में कोई अपना नहीं होता, उनके अंतिम सफर को सम्मानपूर्वक पूरा करना ही उनके लिए सबसे बड़ी सेवा है। संस्था ने कहा कि आगे भी प्रभु की इच्छा और आशीर्वाद से वे इस प्रकार की सेवाएं निरंतर करते रहेंगे।