कैंसर दुनिया की सबसे खतरनाक बीमारियों में से एक मानी जाती है। कोलोरेक्टल कैंसर जैसी कुछ बीमारियां अक्सर दूसरी या तीसरी स्टेज में जाकर पकड़ में आती हैं और इस स्टेज में डॉक्टरों के लिए मरीज की जान बचाना बहुत मुश्किल हो जाता है।
लेकिन क्या हो अगर हम आपसे कहें कि आने वाले टाइम में कुत्तों की मदद से कैंसर की बीमारी का पता बहुत अर्ली स्टेज पर चल जाएगा। दरअसल, इजरायल, अमेरिका, जापान, जर्मनी, ब्रिटेन, फ्रांस और ताइवान जैसे कई देशों में इस समय कुत्तों की मदद से कैंसर का पता लगाने को लेकर प्रयोग किया जा रहा है। अगर ये प्रयोग सफल साबित होते हैं, तो वो दिन दूर नहीं जब कुत्ते सूंघकर कैंसर का पता लगा सकेंगे।
भारत में भी हो रहा प्रयोग
इजरायल, अमेरिका, जापान, जर्मनी, ब्रिटेन, फ्रांस और ताइवान जैसे देशों के अलावा भारत में भी कुत्तों पर प्रयोग हो रहा है। कर्नाटक के छह अलग-अलग अस्पतालों में ट्रेड कुत्तों की मदद से एक स्टडी की गई है।
बेंगलुरु की एक स्टार्टअप कंपनी डॉगनोसिस के द्वारा की गई स्टडी में कुत्तों ने 1502 मरीजों के सैंपल सूंघे और 91 प्रतिशत सटीकता के साथ बता दिया कि किन मरीजों को कैंसर हैं और किन्हें नहीं। डॉगनोसिस की स्टडी शुक्रवार (01 मई, 2026) को जर्नल ऑफ क्लिनिकल ऑन्कोलॉजी में प्रकाशित हुई थी।
बता दें कि डॉगनोसिस के द्वारा की गई यह स्टडी डॉक्टर संजीव कुलगोड की अगुवाई में हुई, जो कर्नाटक के हुब्बली में स्थित रेड ऑन कैंसर सेंटर के सर्जिकल ऑन्कोलॉजिस्ट और उसके डायरेक्टर भी हैं।
कुत्तों में होती है सूंघने की अद्भुत कला
कुत्तों को इंसानों का सबसे वफादार जानवर माना जाता है और इनके अंदर सूंघने की अद्भुत कला होती है। कुत्तों की सूंघने की क्षमता इंसानों से 10 हजार से लेकर एक लाख गुना अधिक तीव्र होती है, जो उन्हें गंध के अणुओं को पकड़ने की अद्भुत शक्ति देती है और यही कारण है कि कुत्ते इंसानों की तुलना में अधिक संवेदनशील माने जाते हैं।
कुत्तों के नाक में लगभग 300 मिलियन गंध रिसेप्टर्स होते हैं, जो उन्हें बीमारी पकड़नें और छिपी हुई वस्तुओं का पता लगाने में सक्षम बनाते हैं। यही वजह है कि उनकी नाक को एक ‘सुपर कंप्यूटर’ माना जाता है।
कुत्तों की मदद से कैंसर का पता कैसे लगाया जाता है?
हॉन्गकॉन्ग के टिमोथी क्वान लो और उनकी टीम ने फ्रंटियर्स इन मेडिसिन में बताया कि कुत्ते इंसानों की शरीर से निकलने वाले कम से भी कम मात्रा के वोलेटाइल ऑर्गेनिक कंपाउंड, जिसे वीओसी भी कहा जाता है, को पहचान लेते हैं। ये गंध शरीर में हो रहे बदलाव या किसी संक्रमण या फिर कैंसर से जुड़ी हो सकती है।
किसी मरीज को कैंसर जैसी गंभीर बीमारी है या नहीं, इसका पता लगाने के लिए सबसे पहले मेडिकल टीम उसको एक मास्क पहनाती है और फिर उसमें 10 मिनट तक सांस लेने के लिए कहती है।
तीन महीने तक असरदार रहने वाले इन मास्क की प्रभावकारिता को लैब सेटिंग में कुत्तों के सामने रखा जाता है। कुत्ते शरीर के वीओसी में हुए बदलावों को भांप लेते हैं और सात तरह के कैंसर की पहचान कर लेते हैं। इतना ही नहीं, कुत्ते शुरुआती स्टेज के कैंसर को भी भांप लेते हैं, जिसका पता लगाना आमतौर पर बहुत मुश्किल माना जाता है।
किसी मरीज को कैंसर जैसी गंभीर बीमारी है या नहीं, इसका पता लगाने के लिए सबसे पहले मेडिकल टीम उसको एक मास्क पहनाती है और फिर उसमें 10 मिनट तक सांस लेने के लिए कहती है।
तीन महीने तक असरदार रहने वाले इन मास्क की प्रभावकारिता को लैब सेटिंग में कुत्तों के सामने रखा जाता है। कुत्ते शरीर के वीओसी में हुए बदलावों को भांप लेते हैं और सात तरह के कैंसर की पहचान कर लेते हैं। इतना ही नहीं, कुत्ते शुरुआती स्टेज के कैंसर को भी भांप लेते हैं, जिसका पता लगाना आमतौर पर बहुत मुश्किल माना जाता है।