राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत ने कहा है कि संगठन ने अपने बढ़ते काम और लोगों की बढ़ती उम्मीदों के बीच अपने स्वयंसेवकों को सशक्त बनाने के लिए विकेंद्रीकरण की शुरुआत की है।
नागपुर में आयोजित एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि ‘जेन जी’ (युवा पीढ़ी) उन विचारधाराओं की ओर आकर्षित होती है, जिसमें राष्ट्र सेवा की भावना हो। उन्होंने कहा कि आरएसएस को अच्छे कामों के लिए इंटरनेट मीडिया पर अपनी सक्रियता बढ़ाने की आवश्यकता है।
जब उनसे पूछा गया कि आरएसएस ने अपनी स्थापना के 100 साल पूरे होने के मौके पर हाल ही में संगठन में क्या बड़े बदलाव किए हैं, इस पर उन्होंने कहा कि आरएसएस का कार्य बड़े स्तर पर बढ़ा है। इसलिए अब विकेंद्रीकरण की जरूरत है।
‘काम का तरीका रहेगा वही’
भागवत ने कहा कि छोटी-छोटी इकाइयां जरूरी कामों को ज्यादा कुशलता से संभालेंगी, जबकि मित्रता रखने और स्वयं मिसाल बनकर नेतृत्व करने का मूल तरीका पहले जैसा ही रहेगा। उन्होंने कहा कि चूंकि आरएसएस से लोगों की उम्मीदें बढ़ गई हैं, इसलिए स्वयंसेवकों को भी अब ज्यादा परिश्रम करना होगा।
इसलिए अब और भी छोटी-छोटी इकाइयां बनाई जाएंगी। जो काम पहले ऊपरी स्तर से होता था, वह अब ये छोटी इकाइयां करेंगी। जब कोई संगठन बड़ा होता है तो यह एक स्वाभाविक बदलाव है। उन्होंने कहा कि अब आरएसएस में 46 प्रांतों (प्रशासनिक इकाइयों) के बजाय 86 संभाग होंगे।उन्होंने स्पष्ट किया कि आरएसएस के काम करने का ढंग नहीं बदलेगा। यह पहले जैसा ही रहेगा।
काम करने का वह तरीका है मित्रता करना और स्वयं मिसाल बनकर बदलाव लाना। जब उनसे पूछा गया कि विपरीत परिस्थितियों में भी संघ का विस्तार कैसे हुआ तो उन्होंने कहा कि किसी भी संगठन के विस्तार में प्रचार-प्रसार से मदद मिल सकती है, लेकिन आरएसएस की असली ताकत कुछ और ही है। संघ का विस्तार ऐसे माध्यमों से नहीं होता। इसका विस्तार इसके काम और इसके कार्यकर्ताओं के बीच आपसी स्नेह से होता है।