ब्रिटेन में हुए एक अध्ययन में लगभग 50% टीनएजर्स ने माना कि भविष्य में उनका शादी करना कोई जरूरी नहीं है। भारत में भी यूगव और सरकारी आंकड़ों के हवाले से बिल्कुल यही तस्वीर उभर रही है, जहां देश का हर चौथा युवा शादी के बंधन से दूर भाग रहा है। मिलेनियल्स से लेकर जेन-जी और जेन-अल्फा तक के लिए, अब विवाह जिंदगी का कोई अनिवार्य पड़ाव नहीं रहा।
फैसले लेने में काफी तेज है ‘जेन-अल्फा’
भारत की कुल आबादी में 25 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा जेन-अल्फा का है। यूगव और रुकम कैपिटल की ‘जेन अल्फा डिकोडेड’ रिपोर्ट बताती है कि यह जनरेशन केवल गैजेट्स चलाने और इंटरनेट की दुनिया में ही आगे नहीं है, बल्कि इनकी व्यावहारिक समझ भी कमाल की है। इन बच्चों में से 10 में से 7 के अंदर अभी से पैसे कमाने की गजब की उत्सुकता देखी गई है। इतना ही नहीं, घरों में होने वाले रोजमर्रा के 66% फैसले सीधे तौर पर इन बच्चों द्वारा प्रभावित होते हैं।
अपनी शर्तों पर जिंदगी जी रही हैं महिलाएं
शादी से दूरी बनाने के मामले में महिलाओं के आंकड़े काफी बड़े बदलाव की ओर इशारा कर रहे हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, साल 2011 से 2019 के बीच उन युवतियों की संख्या में लगभग 48% का भारी इजाफा हुआ है, जो अपनी मर्जी से कभी शादी नहीं करना चाहतीं। 2011 की जनगणना में देश में 7 करोड़ से अधिक सिंगल महिलाएं थीं, और अब यह आंकड़ा 10 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान लगाया जा रहा है। इसका एक बड़ा कारण यह है कि शिक्षा और आर्थिक आत्मनिर्भरता ने महिलाओं के सोचने का नजरिया बदला है। अब वे ऐसे रिश्तों की पक्षधर हैं जहां उन्हें बराबरी का हक मिले और बिना बात के समझौते न करने पड़ें।
बदलते दौर के चौंकाने वाले आंकड़े
राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) के आंकड़े इस सामाजिक बदलाव पर पक्की मुहर लगाते हैं। 2011 में जहां 17.2% युवा अविवाहित थे, वहीं 2019 तक यह अनुपात बढ़कर 23% हो गया। जीवनभर कुंवारे रहने का फैसला करने वाले पुरुषों का आंकड़ा 20.8% से बढ़कर 26.1% और महिलाओं का 13.5% से बढ़कर करीब 20% हो चुका है।
इसी तरह, शादी की उम्र भी खिसक रही है; महिलाएं अब औसतन 22.9 वर्ष और पुरुष 25 वर्ष की उम्र में अपनी पहली शादी कर रहे हैं। जीवनसाथी की तलाश शुरू करने की औसत उम्र भी 27 से बढ़कर 29 साल पहुंच गई है। यहां तक कि डेटिंग प्लेटफॉर्म ‘क्वैक-क्वैक’ के सर्वे में भी 28 वर्ष से अधिक उम्र के 39% डेटर्स ने माना कि विवाह करना कोई मजबूरी नहीं है।
आखिर जिम्मेदारियों से क्यों बच रहे हैं युवा?
दरअसल, आज की पीढ़ी परिवार या बच्चों जैसे किसी भी किस्म के बंधन में बंधना नहीं चाहती। समाज ‘क्या कहेगा’ या रिश्तेदारों के तानों का डर अब पहले जैसा नहीं रहा। सदियों से यह सोच थी कि बुढ़ापे में बच्चे सहारा बनेंगे, लेकिन आज बच्चे नौकरी के चलते अक्सर दूर रहते हैं और आधुनिक सुविधाओं से लैस ‘ओल्ड एज होम’ आसानी से उपलब्ध हैं।
इसके अलावा, महंगे होते जीवन और अस्थिर नौकरियों के कारण युवाओं की पहली प्राथमिकता अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत करना है। वे अपने जीवन के अहम 20वें और 30वें दशक को केवल करियर बनाने और एक साथ कई काम करने में लगा रहे हैं। शादी और बच्चों की भारी-भरकम जिम्मेदारी उठाने के लिए वे खुद को एडल्ट लाइफ के लिए तैयार नहीं मानते। कुल मिलाकर, आज के युवा अपने पैरों पर खड़े होने को ही अपनी सबसे बड़ी सफलता मान रहे हैं और शादी उनके लिए बस एक चॉइस बनकर रह गई है।