क्या मिडिल-ईस्ट में खुलने जा रहा है नया संघर्ष? पाकिस्तान की भूमिका पर बढ़ी चर्चा…

मिडिल-ईस्ट में जंग का एक और मोर्चा खुल गया है। बड़ी बात यह है कि इस युद्ध की लपटें पड़ोसी देश पाकिस्तान तक पहुंचती दिख रही हैं। ऊपर से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ग्रीन सिग्नल देकर पूरी दुनिया में हड़कंप मचा दिया है। दरअसल, सऊदी अरब और ईरान समर्थित यमन के हूती विद्रोहियों के बीच सालों से ठंडे बस्ते में पड़ा संघर्ष अब एक खूनी मोड़ ले चुका है।

पिछले दिनों अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान को हूतियों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई के लिए ‘खुली छूट’ (Green Signal) दे दी है, जिसके बाद सना एयरपोर्ट पर भीषण बमबारी की गई। इससे न केवल मिडिल-ईस्ट में तनाव बढ़ गया है बल्कि पूरी दुनिया में हड़कंप मच गया है।

इस बीच सना अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर सऊदी हमले और उसके जवाब में हूतियों के मिसाइल हमलों से 2022 से लागू अनौपचारिक युद्धविराम टूटने का भी खतरा पैदा हो गया है। एक्सियोस की एक रिपोर्ट में अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से बताया गया कि सऊदी के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने पिछले सप्ताह ट्रंप से बातचीत में हूतियों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई के लिए समर्थन मांगा था, जिसे ट्रंप ने मंजूरी दे दी। इससे पहले सऊदी राजदूत राजकुमारी रीमा बिन्त बंदर ने अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो से मुलाकात की थी, जिसके बाद रुबियो ने सऊदी विदेश मंत्री प्रिंस फैसल बिन फरहान से भी बातचीत की।

कैसे हुई विवाद की शुरुआत?

रिपोर्ट के मुताबिक विवाद की शुरुआत करीब 10 दिन पहले तब हुई, जब ईरान की माहान एयर का एक विमान हूती नियंत्रित सना पहुंचा। यह विमान हूती नेताओं के एक प्रतिनिधिमंडल को ईरान में दिवंगत नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के अंतिम संस्कार में ले गया था। प्रतिनिधिमंडल को लेकर सोमवार को लौट रहे इसी विमान को रोकने के लिए सऊदी समर्थित यमन सरकार ने सना अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के रनवे पर हमला किया, जिसके बाद विमान को होदेदाह हवाई अड्डे की ओर मोड़ना पड़ा।

सऊदी अरब का क्या दावा?

यमन के रक्षा मंत्रालय ने दावा किया कि हूतियों ने यमनिया एयरलाइंस की उड़ान से लौटने से इनकार कर ईरानी विमान से लौटने पर जोर दिया था। वहीं एक अमेरिकी अधिकारी ने आरोप लगाया कि विमान में हथियार, मिसाइलों के पुर्जे और सैन्य विशेषज्ञ भी सवार थे। इस हमले के जवाब में हूतियों ने दक्षिण-पश्चिमी सऊदी अरब के अबहा अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे की ओर बैलिस्टिक मिसाइलें और ड्रोन दागे। हूती सैन्य प्रवक्ता याह्या सरी ने कहा कि यदि सना हवाई अड्डे पर प्रतिबंध नहीं हटाया गया तो सऊदी हवाई क्षेत्र का उपयोग करने वाली अंतरराष्ट्रीय एयरलाइंस भी निशाने पर होंगी। सऊदी नेतृत्व वाले सैन्य गठबंधन ने दावा किया कि दक्षिणी क्षेत्र की ओर दागी गई सभी मिसाइलों को मार गिराया गया है।

पाकिस्तान के लिए ‘करो या मरो’ की स्थिति

इस पूरे घटनाक्रम ने पाकिस्तान को एक ऐसी ‘कैच-22’ (Catch-22) स्थिति में ला खड़ा किया है, जहां से उसका निकलना नामुमकिन लग रहा है। बता दें कि पिछले साल सितंबर में पाकिस्तान और सऊदी अरब ने एक NATO-शैली के रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए थे, जिसके तहत एक देश पर हमला दोनों पर हमला माना जाएगा। ऐसी स्थिति में जब सऊदी अरब पर हूतियों के हमले तेज हो रहे हैं, तो रियाद अपना ‘पाउंड ऑफ फ्लेश’ (अपना हिस्सा) मांगने के लिए तैयार है।

अफगानिस्तान का बहाना बनाकर चतुराई से बचा था पाकिस्तान

पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने यह भी कहा था कि समझौते के तहत उसका परमाणु कार्यक्रम सऊदी अरब के लिए उपलब्ध कराया जाएगा। कई रक्षा विशेषज्ञों का तो यह भी मानना ​​है कि सऊदी अरब ने चुपचाप इसे फंड किया है। ऐसे में, यह ज़ाहिर है कि रियाद अपना फायदा ज़रूर चाहेगा और युद्ध की स्थिति में वह पाकिस्तान से उस फंडिंग के बदले सहयोग चाहेगा। इस साल की शुरुआत में भी जब ईरान ने सऊदी अरब के ऊर्जा ठिकानों को निशाना बनाया था तब दोनों देशों के बीच इस समझौते की आड़ में कई बैठकें हुई थीं। हालांकि, तब पाकिस्तान ने अफगानिस्तान के साथ अपने ही इलाके में संघर्ष शुरू करके खुद को युद्ध में घसीटे जाने से चतुराई से बचा लिया था।

अब दोतरफा जाल में फंसा इस्लामाबाद

वर्तमान में, लगभग 8,000 पाकिस्तानी सैनिक, 16 लड़ाकू विमान (JF-17) और चीनी एयर डिफेंस सिस्टम पहले से ही सऊदी अरब में तैनात हैं। ऐसे में यह आशंका जाहिर की जा रही है कि अगर हूती अपने हमलों को और तेज करते हैं, तो पाकिस्तान पर इस युद्ध में सीधे तौर पर कूदने का भारी दबाव होगा। ऐसे में एक तरफ सऊदी अरब का दबाव है, तो दूसरी तरफ पाकिस्तान खुद अपने घर में बलूच विद्रोहियों, कश्मीर में विरोध प्रदर्शनों और अफगानिस्तान सीमा पर तनाव से जूझ रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि पहले पाकिस्तान ने अफगानिस्तान के साथ संघर्ष छेड़कर सऊदी समझौते से बचने का रास्ता निकाला था, लेकिन इस बार हूतियों के खिलाफ उसे मैदान में उतरना ही पड़ सकता है।

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