पिछले दो दिनों से लुटियन दिल्ली आंदोलन का अखाड़ा बना हुआ है। मंगलवार को जिस तरह राजनीतिक दलों में श्रेय के लिए होड़ मच गई उसके बाद माना जा रहा है कि आमलोगों के बीच छात्रों के आंदोलन को लेकर जिस तरह का मोह बन रहा था वह भंग होगा क्योंकि राजनीतिक चेहरों को आम जनता बहुत अलग नहीं कर पाती है।
लेकिन इसी बीच सरकार के घटक दलों में यह चर्चा भी छिड़ गई है कि अगर कुछ दिन पहले और सक्रियता दिखाई जाती तो संभव था कि आंदोलन यह रूप ही नहीं ले पाता।
आंदोलन में हुआ सोशल मीडिया का इस्तेमाल
सोशल मीडिया का इस्तेमाल ऐसे आंदोलनों में बहुत किया जाता है जो इस आंदोलन में भी हुआ। यह कोशिश होनी चाहिए थी कि सिर्फ सही जानकारी ही ऐसे माध्यमों से जाए। वहीं कुछ दल यह भी मान रहे हैं कि सीजेपी की ओर से वार्ता की पहल के पहले सरकार की ओर से कोशिश होनी चाहिए थी।
ऐसे आंदोलनों में बार बार टूल किट की बात आती है और इस मामले में इसे बल मिल रहा है क्योंकि राहुल गांधी से लेकर कई एक्टिविस्ट तक के ऐसे बयान आते रहे हैं कि देश में छोटे छोटे आंदोलन खड़े करने पड़ेंगे। राहुल गांधी ने तो इंडी गठबंधन की बैठक में ही यह बात कही थी।
राहुल के धरने पर बैठते ही मंत्री को बातचीत के लिए भेजा
साथी दलों का मानना है कि सरकार ने मंगलवार को सही कदम उठाया कि राहुल गांधी और कांग्रेस नेताओं के अलग से आंदोलन पर बैठते ही प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्यमंत्री जितेंद्र सिंह को बातचीत के लिए भेज दिया। यही नहीं संसद में नीट लीक पर चर्चा के लिए भी सहमति दे दी। जो राहुल की मांग थी। वह नहीं माने।
आंदोलन में राजनीतिक दलों की हिस्सेदारी से दूर होगी जनता
वस्तुत: आंदोलन में राजनीतिक दलों की हिस्सेदारी जितनी बढ़ेगी आम जनता इससे दूर होती जाएगी। क्योंकि फिर यह आंदोलन सरकार और विपक्ष के बीच की राजनीतिक लड़ाई दिखेगी जो सामान्यत: चुनावों से पहले कहीं न कहीं सड़क पर दिखता है।
2027 में उत्तर प्रदेश और पंजाब में चुनाव
अगले कुछ महीनों में उत्तर प्रदेश और पंजाब में चुनाव है। प्रदर्शनकारियों में उत्तर प्रदेश के युवा भी खूब दिख रहे हैं। सपा और आम आदमी पार्टी की सक्रियता भी कुछ दिनों से काफी थी जिसमें पीछे छूटते दिखने के बाद मंगलवार को कांग्रेस भी कूदी।
सोमवार को केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा सीजेपी प्रतिनिधिमंडल से मिले और लगने लगा था कि आंदोलन अब खत्म हो जाएगा लेकिन कुछ ही देर बाद शाम को फिर से आंदोलनकारी जंतर मंतर पहुंच गए। दरअसल अब राजनीतिक दल इसे शांत नहीं होने देना चाहते। पर जितने चेहरे राजनीतिक दलों के दिखेंगे उतना मोह भंग होना भी तय है।