भारत की अब मुक्त व्यापार समझौतों (एफटीए) के व्यावहारिक कार्यान्वयन और निर्यातकों को इन समझौतों का उपयोग करने में सहायता प्रदान करने पर ध्यान देना चाहिए।
विशेषज्ञों का मानना है कि एफटीए के दौरान की गई बातचीत और उपयोग की गई बाजार पहुंच के बीच का अंतर देश की सबसे कमजोर कड़ी बना हुआ है।
विशेषज्ञों के अनुसार, भारत का एफटीए उपयोग एतिहासिक रूप से 25 प्रतिशत के आसपास रहा है, जबकि विकसित अर्थव्यवस्थाओं में यह 70-80 प्रतिशत है। इस अंतर को समाप्त करना अब सबसे महत्वपूर्ण व्यापार नीति सुधार बन गया है।
डेलाइट इंडिया के पार्टनर गुलजार डिडवानिया का कहना है, कि भारत की अगली प्राथमिकता एफटीएक का व्यावहारिक कार्यान्वयन होना चाहिए, निर्यातकों को समझौतों का उपयोग करने में मदद करना, नई व्यापार बाधाओं के खिलाफ रक्षा करना और निरंतर निर्यात वृद्धि में बाजार पहुंच को परिवर्तित करना होना चाहिए।
भारत ने अब तक सिंगापुर, जापान, कोरिया, यूएई, आस्ट्रेलिया, आसियान और ईएफटीए ब्लाक के साथ कई व्यापार समझौतों को लागू किया है। इसके अलावा, ओमान, न्यूजीलैंड, यूरोपीय संघ और ब्रिटेन के साथ भी ऐसे समझौतों को अंतिम रूप दिया गया है।
ला फर्म शार्दुल अमरचंद मंगलदास एंड कंपनी में पार्टनर रुद्र कुमार पांडे का भी कहना है कि सबसे तत्काल प्राथमिकता एफटीए उपयोग है।
उन्होंने कहा कि सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (एमएसएमई) के बीच जागरूकता कम है और अधिकांश अन्य समझौतों में प्रमाणन बुनियादी ढांचा अविकसित है।
उन्होंने सुझाव दिया कि हर फर्म जिसमें निर्यात की क्षमता है, उसे उपलब्ध प्राथमिक पहुंच को समझना चाहिए और इसका उपयोग करने के लिए दस्तावेजीकरण और अनुपालन समर्थन होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि एफटीए से भागीदार देशों के गुणवत्ता, ट्रेसबिलिटी और स्थिरता मानकों को पूरा करने वाली फर्में सबसे अधिक लाभान्वित होंगी।पांडे ने कहा कि भारत का निर्यात परिदृश्य उच्च-मूल्य वाली मैन्यूफैक्चरिंग की ओर बढ़ रहा है।
ऐसे में भारत को मानकों और प्रमाणन बुनियादी ढांचे में निवेश करने की आवश्यकता है ताकि फर्में भागीदार देशों की अनुपालन आवश्यकताओं को बिना अत्यधिक लागत के पूरा कर सकें।