ब्रह्मोस की बढ़ती वैश्विक मांग, वियतनाम के बाद इंडोनेशिया के साथ भी समझौता करीब…

कभी अपनी सैन्य जरूरतों के लिए विदेश पर निर्भर रहने वाला भारत अब अत्याधुनिक रक्षा उपकरणों का निर्यात कर रहा है। कई देश भारत के स्वदेशी रक्षा उपकरण खरीदना चाह रहे हैं।

रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने शनिवार को कहा कि वियतनाम के साथ ब्रह्मोस मिसाइल समझौते पर पहले ही हस्ताक्षर हो चुके हैं, जबकि इंडोनेशिया के साथ ऐसा ही समझौता अंतिम चरण में है। गौरतलब है कि फिलीपींस भारत से ब्रह्मोस मिसाइल सिस्टम खरीदने वाला पहला विदेशी खरीदार था।

फिलीपींस को 2024 में ब्रह्मोस मिसाइलों की पहली खेप मिली थी। ब्रह्मोस भारत और रूस द्वारा संयुक्त रूप से निर्मित सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल है।शांगरी-ला संवाद में शामिल होने सिंगापुर पहुंचे रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने कहा, इंडोनेशिया और वियतनाम दोनों के साथ समझौता अंतिम चरण में है। मुझे पता चला है कि वियतनाम के साथ ब्रह्मोस निर्यात के लिए समझौते की शायद सार्वजनिक रूप से इसकी घोषणा नहीं की गई है, लेकिन इस पर हस्ताक्षर हो चुके हैं।

इस महीने की शुरुआत में खबरें आई थीं कि वियतनाम भारत के साथ ब्रह्मोस मिसाइल समझौते पर हस्ताक्षर करने वाला है, लेकिन इसका अभी तक सार्वजनिक रूप से आधिकारिक घोषणा नहीं की गई थी। इंडोनेशिया ने भी मार्च में कहा था कि उसने भारत से ब्रह्मोस मिसाइल प्रणाली खरीदने के लिए समझौता किया है।

हालांकि, वियतनाम और इंडोनेशिया के साथ हुए सौदों की राशि के बारे में अभी तक आधिकारिक तौर पर जानकारी नहीं दी गई है, लेकिन रायटर ने सूत्रों के हवाले से बताया कि संभवत: वियतनाम के साथ समझौता प्रशिक्षण और रसद संबंधी सहायता सहित लगभग 60 अरब रुपये का है।

रक्षा सचिव ने कहा, आप रक्षा प्रौद्योगिकी उन्हीं के साथ साझा करते हैं जिन पर आप भरोसा करते हैं। हम आप सभी को ‘मित्र देश’ मानते हैं जिनके साथ हम उन्नत रक्षा प्रौद्योगिकियों को साझा कर सकते हैं”। दक्षिणपूर्व एशियाई राष्ट्र संघ (आसियान) में ब्रुनेई, कंबोडिया, इंडोनेशिया, लाओस, मलेशिया, म्यांमार, फिलीपींस, सिंगापुर, थाईलैंड, तिमोर-लेस्ते और वियतनाम शामिल हैं।

दक्षिण चीन सागर में फिलीपींस और वियतनाम सहित कई आसियान सदस्य देशों का चीन के साथ विवाद है। भारत द्वारा इस क्षेत्र के देशों को ब्रह्मोस मिसाइलों का निर्यात महत्वपूर्ण है।रक्षा सचिव ने शांगरी-ला संवाद संवाद में कहा, भारत लचीली आपूर्ति शृंखलाओं, भरोसेमंद रक्षा साझेदारियों, सुरक्षित समुद्री संसाधनों और नवाचार सहयोग के निर्माण के लिए भागीदारों के साथ काम करने के लिए तैयार है।

हाल के वर्षों के सबक स्पष्ट हैं। लचीले, भरोसेमंद, विविध और तकनीकी रूप से अनुकूलनीय रक्षा औद्योगिक इकोसिस्टम की जरूरत है। भारत के लिए लचीलापन केवल आत्मनिर्भरता के बारे में नहीं है, बल्कि विश्वसनीय साझेदारी, नवाचार इकोसिस्टम और सुरक्षित आपूर्ति शृंखलाओं के बारे में भी है जो क्षेत्रीय और वैश्विक स्थिरता में योगदान करते हैं।

भारत ने पिछले एक दशक में रक्षा क्षेत्र में किए हैं महत्वपूर्ण सुधार

रक्षा सचिव ने कहा कि भारत ने पिछले एक दशक में रक्षा उत्पादन, नवाचार और निर्यात में महत्वपूर्ण सुधार किए हैं। भारत ने इस क्षेत्र को निजी क्षेत्र की अधिक भागीदारी के लिए खोला है, स्टार्टअप और लघु उद्योगों को प्रोत्साहित किया है, स्वदेशी डिजाइन और विनिर्माण को मजबूत किया है और वैश्विक भागीदारों के साथ सहयोग का विस्तार किया है।

भारत न केवल अपने सशस्त्र बलों का आधुनिकीकरण कर रहा है, बल्कि विश्वसनीय रक्षा विनिर्माण और रखरखाव केंद्र के रूप में भी उभर रहा है। भारत के रक्षा उत्पादन में सरकारी कंपनियों का हिस्सा लगभग 72 प्रतिशत है, जबकि शेष योगदान निजी क्षेत्र का है। विश्व की शीर्ष 100 हथियार उत्पादक कंपनियों में तीन भारतीय सरकारी रक्षा कंपनियां शामिल हैं।

रक्षा सचिव ने कहा, हमारा उद्देश्य विशिष्ट गुट बनाना नहीं, बल्कि समावेशी और विश्वसनीय साझेदारी बनाना है जो सामूहिक सुरक्षा को मजबूत करे और रणनीतिक कमजोरियों को कम करे। भारतीय रक्षा उद्योग ने मिसाइल प्रणालियों, लड़ाकू विमानों और मुख्य युद्धक टैंकों जैसे क्षेत्रों में क्षमताएं विकसित कर ली हैं।

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