सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला, बच्चों के मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन पर नए दिशा-निर्देश जारी…

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि बच्चों को ‘सिर्फ साक्ष्य की वस्तु’ के रूप में नहीं देखा जा सकता है और मनोवैज्ञानिक या मनोचिकित्सकीय मूल्यांकन को नियमित रूप से उन विवादों को संतुष्ट करने के लिए नहीं किया जाना चाहिए जो अलग हुए माता-पिता के बीच कस्टडी और विजिटेशन के मामलों में उत्पन्न होते हैं।

जस्टिस संजय करोल और नोंगमेइकापम कोटिस्वर सिंह की पीठ ने गुरुवार को कस्टडी, विजिटेशन या माता-पिता की पहुंच से संबंधित मामलों में छोटे बच्चों के मनोवैज्ञानिक या मनोचिकित्सकीय मूल्यांकन के लिए दिशा-निर्देशों की एक शृंखला जारी की।

सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देश

यह दिशा-निर्देश एक ऐसे फैसले में जारी किए गए, जिसने बॉम्बे हाई कोर्ट के आदेश को संशोधित किया और उन महत्वपूर्ण दिशा-निर्देशों को रद कर दिया, जिन्होंने एक चार सदस्यीय मनोवैज्ञानिकों और विशेषज्ञों के पैनल को एक लड़की का मूल्यांकन करने की अनुमति दी थी, जिसके पिता पर बच्चों के यौन अपराधों से संरक्षण अधिनियम (पाक्सो) के तहत आरोप हैं।

फैसले में कहा गया कि अदालतों को बच्चे के पीड़ितों के साथ मनोवैज्ञानिक बातचीत करते समय ‘न्यूनतम हस्तक्षेप और न्यूनतम एक्सपोजर के सिद्धांत’ को अपनाना चाहिए।

जस्टिस सिंह ने 65 पृष्ठों के फैसले में नेल्सन मंडेला का उद्धरण देते हुए कहा, ‘एक समाज की आत्मा का कोई भी गहरा रहस्योद्घाटन नहीं हो सकता है जितना कि यह अपने बच्चों के साथ व्यवहार करता है।’

अदालत ने कहा, ‘सभी प्रक्रियाओं में, विशेष रूप से छोटे बच्चे के मामले में जिसे पाक्सो अधिनियम के तहत पीड़ित माना गया है, सर्वोच्च प्राथमिकता हमेशा बच्चे की भलाई, भावनात्मक सुरक्षा, गरिमा और मनोवैज्ञानिक कल्याण होनी चाहिए।’

दिशानिर्देश में पीठ ने कहा कि एक बच्चे के पीड़ित का मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन नियमित रूप से नहीं किया जाना चाहिए, केवल इसलिए कि कस्टडी, विजिटेशन या माता-पिता की पहुंच के मुकदमे माता-पिता या रिश्तेदारों के बीच उत्पन्न हुए हैं।

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